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संपादकीयः चीते की फिक्र

यों बाघ और शेर सहित कई अन्य वन्यजीवों के मामले में राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक अभियान चले हैं और इस वजह से उनकी संख्या में गिरावट पर कुछ हद तक नियंत्रण पाया गया है, लेकिन दुर्लभ प्रजाति के भारतीय चीते जैसे कुछ पशुओं को लेकर इस तरह की चिंता अभी सामने नहीं आई है।

Author Published on: January 30, 2020 2:31 AM
सुप्रीम कोर्ट ने प्राधिकरण की मांग पर सकारात्मक रुख जाहिर किया और केंद्र सरकार को अफ्रीकी चीते को भारत में उचित प्राकृतिक वास तक लाने की इजाजत दे दी।

जिन वन्यजीवों के सामने जीवन-स्थितियां चुनौतीपूर्ण हैं और जिनके कम या लुप्त होने के खतरे मंडरा रहे हैं, उनके संरक्षण के लिए सरकारी कवायदों में कमी नहीं है। इसके बावजूद कई ऐसे पशु-पक्षी हैं, जो धीरे-धीरे विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुके हैं। यों बाघ और शेर सहित कई अन्य वन्यजीवों के मामले में राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक अभियान चले हैं और इस वजह से उनकी संख्या में गिरावट पर कुछ हद तक नियंत्रण पाया गया है, लेकिन दुर्लभ प्रजाति के भारतीय चीते जैसे कुछ पशुओं को लेकर इस तरह की चिंता अभी सामने नहीं आई है। यही वजह है कि इसके सामने विलुप्त होने का खतरा ज्यादा है। इसके मद्देनजर राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण यानी एनटीसीए ने सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दायर कर नामीबिया से अफ्रीकी चीता लाने की अनुमति मांगी थी।

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने प्राधिकरण की मांग पर सकारात्मक रुख जाहिर किया और केंद्र सरकार को अफ्रीकी चीते को भारत में उचित प्राकृतिक वास तक लाने की इजाजत दे दी। अदालत ने अपनी निगरानी में काम करने वाली तीन सदस्यों की एक समिति का गठन किया है, जो इस मुद्दे पर फैसला लेने में एनटीसीए का मार्गदर्शन करेगी। विलुप्त होने के खतरे सामना कर रहे भारतीय चीते के लिए जताई जाने वाली चिंता से आगे निश्चित रूप से यह एक व्यावहारिक फैसला है, लेकिन सवाल है कि आखिर तब क्या किया जा रहा था जब इस दुर्लभ प्रजाति के पशु की जीवन-स्थितियों के सामने संकट गहरा रहा था!

हालांकि शीर्ष अदालत के सामने यह यह दलील दी गई कि अफ्रीकी चीते को उचित वास तक लाने का काम फिलहाल प्रायोगिक तौर पर किया जाएगा, ताकि इस बात का आकलन किया जा सके कि वे भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल ढल पाते हैं या नहीं। इस पक्ष पर ज्यादा गंभीरता से काम करने की जरूरत इसलिए भी है कि दुनिया की अलग-अलग जलवायु में रहने वाले जीवों की प्रकृति अपनी पर्यावरण स्थितियों के अनुकूल होती है और दूसरी जगहों पर ले जाए जाने पर उनकी मौत तक हो जा सकती है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि वन्यजीवों के संरक्षण से संबंधित कानूनों को धता बताने और इंसानी बस्तियों के विस्तार के साथ-साथ वन क्षेत्रों का दायरा छोटा होते जाने से लेकर पर्यावरण में तेजी से बदलाव की वजह से पहले ही अनेक जंगली जीवों के अस्तित्व के सामने चुनौतियां गहरा रही हैं।

कुछ समय पहले सामने आए एक शोध अध्ययन में यह बताया गया था कि पिछली सदी की शुरुआत में समूची दुनिया में लगभग एक लाख चीते थे। लेकिन आज घटते हुए इनकी संख्या सात हजार से भी नीचे आ चुकी है। यहां तक कि जिस अफ्रीकी देश केन्या के मासीमारा को चीतों का गढ़ माना जाता है, वहां भी इनकी तादाद में अनुमान से ज्यादा गिरावट पाई गई। यह विडंबना देश के लगभग हर क्षेत्र में कायम दिखती है कि जब तक किसी समस्या का स्तर गहराते हुए चिंता के गंभीर पैमाने तक नहीं पहुंच जाता है, तब तक संबंधित महमकों की नींद नहीं खुलती।

वन्यजीवों की दुनिया पर नजर रखने वालों और पर्यावरणविदों की ओर से लगातार समय-समय पर ऐसी अध्ययन रिपोर्ट जारी की जाती हैं, जिसमें विलुप्ति के खतरे का सामना करने वाले जीवों को लेकर व्यापक सुझाव होते हैं। लेकिन मुश्किल यह है कि इन पर समय रहते गौर नहीं किया जाता। यह बेवजह नहीं है कि भारत सहित दुनिया भर में कई ऐसे वन्यजीवों का अस्तित्व खतरे में है या कई विलुप्त भी हो गए, जिन्हें बचाया जा सकता था।

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