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संपादकीयः लोकतंत्र का रास्ता

विडंबना यह है कि राज्य में राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच आपसी बयानबाजी से उपजी तनातनी का असर सामान्य गतिविधियों पर भी पड़ रहा है। हाल में राज्य सरकार ने एक नए नियम के तहत कुलाधिपति और राज्य के विश्वविद्यालयों के बीच प्रत्यक्ष संवाद का माध्यम उच्च शिक्षा विभाग के जरिए तय कर दिया।

Author Published on: December 26, 2019 2:25 AM
पश्चिम बंगाल में राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच चल रही प्रत्यक्ष-परोक्ष तनातनी

पश्चिम बंगाल में राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच चल रही प्रत्यक्ष-परोक्ष तनातनी में कुछ सुधार होने के बजाय स्थिति और बिगड़ती जा रही है, तो इससे यही जाहिर होता है कि दोनों पक्षों के बीच संवाद में कोई बड़ी कमी है। लेकिन मंगलवार को जैसी स्थिति पैदा हुई, वह न तो लोकतंत्र के लिए उचित है, न राजनीतिक उथल-पुथल से उपजी समस्या को दूर करने में उससे कोई मदद मिलेगी। गौरतलब है कि राज्य के राज्यपाल और कुलाधिपति जगदीश धनखड़ जादवपुर विश्वविद्यालय के वार्षिक दीक्षांत समारोह में भाग लेने गए थे, लेकिन वहां भारी संख्या में जमा प्रदर्शनकारियों ने उन्हें परिसर में प्रवेश करने से रोक दिया और आखिरकार उन्हें वापस लौटना पड़ा। दरअसल, वहां जमा बड़ी तादाद में विद्यार्थी नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे और नारे लगा रहे थे। विद्यार्थियों के मुताबिक उन्होंने पहले से ही तय कर लिया था कि वे दीक्षांत समारोह में कुलाधिपति के हाथों से डिग्री नहीं लेंगे। हो सकता है कि संबंधित विद्यार्थी किसी खास मुद्दे पर विरोध स्वरूप राज्यपाल के हाथों डिग्री नहीं लेने की राय रखते हों और यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन एक निर्धारित कार्यक्रम में राज्यपाल को भाग लेने से रोकने को कितना उचित माना जाएगा?

यह बेवजह नहीं है कि राज्यपाल ने इस संबंध में प्रतिक्रिया देते हुए साफ शब्दों में कहा कि यह घटना विश्वविद्यालय में कानून के राज की गंभीरता से समझौता किए जाने का उदाहरण है। किसी मुद्दे पर विरोध जताना या प्रदर्शन करने के अधिकार के समांतर अगर कोई समूह कानून और शासन को ताक पर रख देता है तो निश्चित रूप से यह एक गंभीर स्थिति है। यह राज्य सरकार और पुलिस की जिम्मेदारी है कि वह ऐसी अप्रिय स्थिति नहीं पैदा होने दे। लेकिन अगर वहां मौजूद प्रदर्शनकारियों के विरोध की वजह से राज्यपाल को लौटना पड़ा तो यह अपने आप में वहां की ड्यूटी के लिए जवाबदेह पुलिसकर्मियों की नाकामी है। आखिर पुलिस जादवपुर विश्वविद्यालय के बाहर मौजूद प्रदर्शनकारियों के बीच से राज्यपाल को परिसर में सुरक्षित ले जाने में कैसे नाकाम रही? अगर पर्याप्त पुलिसकर्मियों की तैनाती नहीं थी, तो इसका कारण क्या था? इसके अलावा, खबरों के मुताबिक अगर कुलाधिपति या राज्यपाल ने कुलपति को नियम-पुस्तिका के अनुसार चलने और दीक्षांत समारोह के संबंध में स्पष्ट निर्देश दिए थे, तो उसका पालन करने को लेकर लापरवाही की वजह क्या हो सकती है? इस मामले में नियम-कायदे क्या कहते हैं?

विडंबना यह है कि राज्य में राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच आपसी बयानबाजी से उपजी तनातनी का असर सामान्य गतिविधियों पर भी पड़ रहा है। हाल में राज्य सरकार ने एक नए नियम के तहत कुलाधिपति और राज्य के विश्वविद्यालयों के बीच प्रत्यक्ष संवाद का माध्यम उच्च शिक्षा विभाग के जरिए तय कर दिया। इसी तरह के मतभेद की पृष्ठभूमि में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस ने राज्यपाल पर राज्य में समांतर सरकार चलाने का आरोप लगाया था। लेकिन बात शायद तब ज्यादा बढ़ गई जब सीएए के खिलाफ रैली आयोजित करने और उसमें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भाग लेने पर राज्यपाल ने एक ट्वीट के जरिए आपत्ति जताई। जहां तक नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर पर विरोध जताने का सवाल है, तो देश के अलग-अलग हिस्से में इस मसले पर विरोध प्रदर्शन जारी हैं। इस पर व्यापक बहस भी चल रही है। लेकिन शासन के सामान्य कामकाज को सहजता से चलने देने से किसे दिक्कत हो सकती है? आखिर इन कामों का अंतिम लाभ आम जनता को ही मिलता है।

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