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संपादकीयः भूजल का प्रबंधन

देश में ऐसे तमाम इलाके हैं, जहां भूजल का स्तर चिंताजनक पैमाने तक नीचे चला गया है। इसका एक बड़ा असर फसलों के उत्पादन के चक्र पर पड़ा है, जिसमें सिंचाई के लिए ज्यादा पानी की जरूरत वाली फसलें बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। हाल के दिनों में यह राय सामने आई है कि सिंचाई के लिए जल के बढ़ते संकट के मद्देनजर कम पानी की जरूरत वाली वैकल्पिक फसलें उगाने और सूक्ष्म सिंचाई की ओर कदम बढ़ाने की जरूरत है।

Author Published on: December 27, 2019 1:41 AM
हाल के दिनों में यह राय सामने आई है कि सिंचाई के लिए जल के बढ़ते संकट के मद्देनजर कम पानी की जरूरत वाली वैकल्पिक फसलें उगाने और सूक्ष्म सिंचाई की ओर कदम बढ़ाने की जरूरत है। (फोटो- Flickr)

भूजल का गिरता स्तर और इसकी वजह से भविष्य में गहराने वाले संकट के मसले पर पिछले कुछ सालों से लगातार चर्चा होती रही है। इस चिंता के मद्देनजर न केवल भारत, बल्कि वैश्विक पैमाने पर सम्मेलनों और सेमिनारों में आने वाले दिनों में पानी के अभाव को लेकर चेतावनी दी जाती रही है। लेकिन चिंता जताना और संकट का हल निकालना अलग-अलग बातें हैं। यह सही है कि सरकार की ओर से जल संरक्षण को लेकर कई कार्यक्रम संचालित हो रहे हैं तो उनका मकसद चुनौतियों से पार पाना ही है। लेकिन यह भी सच है कि स्थानीय हालात और जरूरतों के आधार पर अगर कोई पहलकदमी होती है, तभी इस संकट से पार पाने की उम्मीद की जा सकती है। इस लिहाज से देखें तो बुधवार को लखनऊ में प्रधानमंत्री ने जिस ‘अटल भूजल योजना’ की शुरुआत की है, वह इस दिशा में एक अहम कदम है। अगर यह योजना अपने बुनियादी स्वरूप में जमीन पर उतरती है तो इससे फिलहाल सात राज्यों के आठ हजार तीन सौ पचास गांवों को लाभ मिलने की उम्मीद है।

दरअसल, भूजल के स्तर को लेकर चिंता लंबे समय जताई जाती रही है, लेकिन इस गहराती समस्या से निपटा कैसे जाए, इसकी दिशा अभी पूरी तरह साफ नहीं रही है। न केवल वर्षा से जल के संरक्षण के पहलू पर कोई बड़ी कार्ययोजना जमीन पर नहीं उतर पाई है, न अन्य स्रोतों की वास्तविक स्थिति का आकलन करके उसके समाधान को लेकर ठोस पहल हुई है। हालांकि ‘अटल भूजल योजना’ की शुरुआत के करीब छह महीने पहले भी प्रधानमंत्री ने पानी की एक-एक बूंद के संरक्षण को लेकर जागरूकता अभियान शुरू करने पर जोर दिया था। यह अपने आप में यह बताने के लिए काफी है कि भूजल के स्तर और समग्र पैमाने पर जल की उपलब्धता को लेकर सरकार फिक्रमंद जरूर है, लेकिन शायद एक समग्र योजना के साथ जमीनी अमल अभी बाकी है। समस्या यह है कि भारी पैमाने पर पानी का बेलगाम उपयोग और उसकी बर्बादी करने वाले बड़ी कंपनियों और संस्थानों पर शायद ही किसी की लगाम है। यह गांवों और शहरों में वर्षा जल के संरक्षण को लेकर सजगता नहीं होने और इससे पैदा होने वाली समस्या से इतर एक पहलू है, जिसमें भारी मात्रा में पानी की बर्बादी होती है। सवाल है कि जल संरक्षण को लेकर जताई जाने वाली चिंता के मद्देनजर क्या इस समस्या के बुनियादी पहलुओं पर भी गौर किया जाएगा?

देश में ऐसे तमाम इलाके हैं, जहां भूजल का स्तर चिंताजनक पैमाने तक नीचे चला गया है। इसका एक बड़ा असर फसलों के उत्पादन के चक्र पर पड़ा है, जिसमें सिंचाई के लिए ज्यादा पानी की जरूरत वाली फसलें बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। हाल के दिनों में यह राय सामने आई है कि सिंचाई के लिए जल के बढ़ते संकट के मद्देनजर कम पानी की जरूरत वाली वैकल्पिक फसलें उगाने और सूक्ष्म सिंचाई की ओर कदम बढ़ाने की जरूरत है। हालांकि यह किसी से छिपा नहीं है कि हमारे देश में पानी के संरक्षण के कई पारंपरिक तौर-तरीके चलन में रहे हैं। लेकिन यह समझना मुश्किल है कि आखिर किन वजहों से हम उन परंपराओं से दूर होते गए।

आखिर ऐसा कैसे मुमकिन हुआ कि अपने जीवन के स्रोत के रूप में पानी की अहमियत को गौण हो जाने दिया और नतीजतन आज भूजल के गिरते स्तर से लेकर प्यास तक एक बड़ी समस्या के रूप में हमारे सामने है। समाज और सरकार की जिम्मेदारी के बरक्स पानी आज लगभग पूरी तरह बाजार के हवाले हो गया है। इतना तय है कि संकट का सही आकलन और उसके मुताबिक हल निकालने की कोशिश समय रहते शुरू नहीं की गई तो समस्या बेहद सकती है।

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