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संंपादकीयः उपचुनावों के संकेत

गुरुवार को आए उपचुनावों के नतीजों के संकेत साफ हैं। विपक्ष पर भारतीय जनता पार्टी की दमदार बढ़त का सिलसिला कायम है।

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गुरुवार को आए उपचुनावों के नतीजों के संकेत साफ हैं। विपक्ष पर भारतीय जनता पार्टी की दमदार बढ़त का सिलसिला कायम है। श्रीनगर लोकसभा सीट के अलावा दस विधानसभा सीटों पर उपचुनाव कराए गए थे, जो कि दस राज्यों से संबंधित हैं। इनमें से दो-दो सीटें कर्नाटक और मध्यप्रदेश की थीं और एक-एक सीट पश्चिम बंगाल, असम, राजस्थान, झारखंड, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली की। दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और झारखंड को छोड़, सब जगह सत्तारूढ़ दलों को सफलता मिली है। इनमें सबसे ध्यान खींचने वाला परिणाम रहा दिल्ली की राजौरी गार्डन विधानसभा सीट का। दिल्ली नगर निगम के चुनाव से ऐन पहले आए उपचुनाव के नतीजे ने आम आदमी पार्टी की जमीन खिसकने के संकेत दिए हैं। यहां से भाजपा-अकाली दल के साझा उम्मीदवार की शानदार जीत हुई; उसे पचास फीसद से ज्यादा मत मिले। और आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार को ऐसी जबर्दस्त शिकस्त खानी पड़ी, जिसकी बहुतों को कल्पना भी नहीं रही होगी। आप काउम्मीदवार तीसरे नंबर पर रहा। उसकी जमानत भी जब्त हो गई। दूसरे नंबर पर कांग्रेस रही। पिछले विधानसभा चुनाव के बरक्स देखें, तो कांग्रेस ने अपना प्रदर्शन काफी सुधारा है, उसके मत-प्रतिशत में काफी इजाफा हुआ है। पर भाजपा और उसके मत-प्रतिशत में अब भी काफी अंतर है। अलबत्ता राजौरी गार्डन सीट पर भाजपा को अकाली दल के परंपरागत या सामुदायिक आधार का भी लाभ मिला होगा।

कर्नाटक की दोनों सीटें कांग्रेस की झोली में गर्इं। पर ये सीटें पहले से कांग्रेस के पास थीं जिन्हें बरकरार रखने में वह सफल हुई है, अलबत्ता थोड़े बढ़े हुए अंतर के साथ। पर इन सीटों के आधार पर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के बारे में कोई निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं होगा। उपचुनाव से पहले, कांग्रेस भी यह कह चुकी है और भाजपा भी, कि इन दो सीटों के नतीजों को सिद्धरमैया सरकार के कामकाज पर जनमत संग्रह नहीं माना जाएगा। लेकिन यह उल्लेखनीय है कि कर्नाटक में भाजपा ने उत्तर प्रदेश की ही तरकीब अपनाई थी। सोशल इंजीनियरिंग, मोदी कारक, सत्ता-विरोधी असंतोष, बागी कांग्रेसियों की मदद, पर उसकी आस पूरी नहीं हुई। हिमाचल प्रदेश की जिस सुरक्षित सीट पर उपचुनाव हुआ वह भाजपा के ही एक दिग्गज के निधन से खाली हुई थी और पार्टी ने वहां उनके बेटे को उम्मीदवार बनाया था, जिन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार को आठ हजार से ज्यादा वोटों से हराया।
मध्यप्रदेश की दोनों सीटें भाजपा के पास थीं और दोनों को उसने बरकरार रखा।

अलबत्ता एक सीट वह पच्चीस हजार से ज्यादा वोटों से जीती और दूसरी पर उसे कड़ा मुकाबला झेलना पड़ा। झारखंड की जिस सीट पर उपचुनाव हुआ वह झारखंड मुक्ति मोर्चा की झोली में आई, पर यह आदिवाली बहुल सीट पहले भी उसके पास थी। यही राजस्थान, असम और पश्चिम बंगाल में हुआ, जो सीट जिसके पास थी उसने बरकररार रखी। राजस्थान व असम में भाजपा, और बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने। लेकिन बंगाल का नतीजा कुछ खास है जो राज्य में भाजपा के उभार की तरफ इशारा करता है। यहां एक सीट पर हुए उपचुनाव में तृणमूल के उम्मीदवार ने साढ़े बयालीस हजार वोटों से जीत दर्ज की, पर यहां दूसरे नंबर पर भाजपा का प्रत्याशी रहा, जिसे लगभग तिरपन हजार वोट मिले। करीब साढ़े सत्रह हजार वोट पाकर भाकपा का उम्मीदवार तीसरे नबंर पर रहा, और कांग्रेस को बस ढाई हजार के आसपास वोट मिले। इस तरह ये उपचुनाव भाजपा के दबदबे और विस्तार की ही पुष्टि करते हैं।

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