ताज़ा खबर
 

संपादकीयः मुगाबे के बाद

शायद ही किसी ने सोचा होगा कि दुनिया के सबसे उम्रदराज शासक रॉबर्ट मुगाबे का यह हश्र होगा।

Author November 17, 2017 2:52 AM
रॉबर्ट मुगाबे जिस देश पर वे सैंतीस सालों से एकछत्र राज करते आ रहे थे वहां की सेना ने उन्हें बुधवार को नजरबंद कर दिया।

शायद ही किसी ने सोचा होगा कि दुनिया के सबसे उम्रदराज शासक रॉबर्ट मुगाबे का यह हश्र होगा। जिस देश पर वे सैंतीस सालों से एकछत्र राज करते आ रहे थे वहां की सेना ने उन्हें बुधवार को नजरबंद कर दिया। जिम्बाबवे पर अब वहां की सेना का राज है और राजधानी हरारे की सड़कों पर सेना के टैंक तैनात हैं। लेकिन सेना ने इसे तख्तापलट मानने से इनकार किया है; अपनी सफाई में उसने कहा है कि यह बस एक ‘स्वच्छता कार्रवाई’ है। आखिर क्या मतलब है इसका? मुगाबे के अलावा उनके कई मंत्री भी बर्खास्त और नजरबंद कर दिए गए हैं। क्या यह घटनाक्रम बस सेना की महत्त्वाकांक्षा का परिणाम है, या इसके तार देश की राजनीति से भी जुड़े हैं? तमाम राजनीतिक व कूटनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि मुगाबे का तख्ता पलटे जाने के पीछे सत्तारूढ़ रही पार्टी जनू-पीएफ की भीतरी लड़ाई और मुगाबे के राजनीतिक उत्तराधिकार का मुद््दा रहा है। अगले साल संभावित राष्ट्रपति चुनाव में तिरानबे साल के मुगाबे के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी थे उपराष्ट्रपति इमर्सन मनंगावा। लेकिन मुगाबे अपनी पत्नी ग्रेसी को कमान सौंपना चाहते थे। और इसी की खातिर उन्होंने अगले महीने होने वाले जनू-पीएफ के अधिवेशन में ग्रेसी को उपराष्ट्रपति बनाने की घोषणा करने की तैयारी कर ली थी।

यह इमर्सन को कैसे रास आ सकता था? पार्टी के अन्य बहुत-से नेता भी इसके लिए तैयार नहीं थे। इस नाराजगी और सेना द्वारा तख्ता पलट के बीच क्या रिश्ता है और कैसे यह समीकरण बना, इसकी कहानी कुछ दिनों में सामने आ जाएगी। मुगाबे दशकों से राष्ट्रपति के तौर पर जिम्बाबवे पर राज करते आ रहे थे तो इसके पीछे राजनीति पर उनकी गहरी पकड़ के अलावा उनकी छवि का भी हाथ था। देश के लोग उन्हें आजादी की लड़ाई के नायक के तौर पर देखते रहे। लेकिन ग्रेसी प्रकरण ने साफ कर दिया कि मुगाबे पार्टी को निजी जागीर में बदल देना चाहते हैं। पार्टी के बहुत-से नेताओं के अलावा आम लोगों को भी यह पसंद नहीं था; उन्हें लगता है कि एक समय का उनका हीरो बदल गया है। यही कारण है कि तख्ता पलट के विरोध में लोग सड़कों पर नहीं उतरे। अलबत्ता उन्हें एक शंका और अनिश्चितता जरूर घेरे है कि जाने आगे क्या होगा। मुगाबे लंबे समय से पश्चिमी देशों की निगाह में खटकते रहे हैं। पश्चिमी दुनिया उन्हें एक निरंकुश शासक के रूप में देखती आई है जिसने अर्थव्यवस्था को बर्बादी की राह पर धकेला और जो सत्ता में बने रहने के लिए बेहिचक हिंसा का सहारा लेता रहा।

यही वजह है कि सैन्य तख्ता पलट जैसी घटनाओं पर तीखी प्रतिक्रिया करने वाले पश्चिमी देश फिलहाल खामोश हैं। अब सबकी निगाहें इस पर लगी हैं कि सेना का आगे कदम क्या होगा? क्या सचमुच उसका इरादा बस मुगाबे को घेरे हुए अवांछित तत्त्वों को सत्ता से बेदखल करना था? क्या इन तत्त्वों से छुटकारा दिला कर सेना मुगाबे को राष्ट्रपति पद पर बहाल कर देगी? अगर सेना राष्ट्रपति पद पर मुगाबे की वापसी भी कर दे, जिसकी बहुत कम संभावना है, तो उनकी ताकत पहले जैसी नहीं होगी, न शासन में न पार्टी में। क्या राष्ट्रपति पद का अगला चुनाव, जो कि अगले ही साल होना था, अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक होगा? फिलहाल इन सवालों के जवाब अनुत्तरित हैं।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App