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संपादकीयः प्रधानमंत्री की नसीहत

प्रधानमंत्री ने मंत्रियों के सदन से गैरहाजिर रहने पर कड़ी नाराजगी जताई। ऐसा पहली बार हुआ है जब सरकार के मुखिया ने मंत्रियों के ऐसे गैरजिम्मेदाराना रवैए पर सख्त रुख दिखाया। प्रधानमंत्री ने साफ कहा कि अब जो मंत्री सदन से गैरहाजिर रहेगा उसके बारे में उन्हें उसी दिन शाम को सूचना दी जाए।

Author Published on: July 18, 2019 1:37 AM
पीएम नरेंद्र मोदी। (file pic)

संसद सत्र के दौरान मंत्रियों और सांसदों के सदन से गैरहाजिर रहने की प्रवृत्ति वाकई चिंताजनक है। हालांकि हमारे जनप्रतिनिधियों के बीच यह चलन कोई नया नहीं है। ऐसा किसी एक पार्टी में नहीं, बल्कि सारे दलों में देखने को मिलता है। इसीलिए पार्टी अध्यक्षों, सदन के अध्यक्ष और सभापति की ओर से कई बारयह कहा भी जाता रहा है कि सांसद सदन में मौजूद रहा करें। इससे एक बात तो साफ होती है कि बहुत सारे जनप्रतिनिधि संसद सत्र को गंभीरता से नहीं लेते। वे किसी न किसी बहाने सदन में आने से बचते हैं। उन्हें लगता है अब पांच साल के लिए चुन कर आ तो गए ही हैं, सदन की बैठक में गए तो गए, नहीं गए तो कौन पूछने वाला है! विधानसभाएं भी इस बीमारी से अछूती नहीं हैं। ऐसे में जनप्रतिनिधियों और उनकी भूमिका को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। जनता को भी लगता है कि जिसे हमने चुन कर भेजा है वह सदन में नहीं जाता है और अपने इलाके की समस्याओं को सदन में उठाता ही नहीं है तो ऐसे जनप्रतिनिधि का क्या मतलब रह जाता है! लेकिन लगता है, हमारे जनप्रतिनिधियों के लिए इन सबका कोई अर्थ नहीं है।

शायद इसी चिंता के मद्देनजर मंगलवार को प्रधानमंत्री ने मंत्रियों के सदन से गैरहाजिर रहने पर कड़ी नाराजगी जताई। ऐसा पहली बार हुआ है जब सरकार के मुखिया ने मंत्रियों के ऐसे गैरजिम्मेदाराना रवैए पर सख्त रुख दिखाया। प्रधानमंत्री ने साफ कहा कि अब जो मंत्री सदन से गैरहाजिर रहेगा उसके बारे में उन्हें उसी दिन शाम को सूचना दी जाए। सदन में मंत्रियों की रोस्टर ड्यूटी लगती है। लेकिन देखा जा रहा है कि ड्यूटी लगने के बावजूद मंत्री सदन में नहीं पहुंचते हैं। यह गैरजिम्मेदारी के साथ अनुशासनहीनता को भी दर्शाता है। जब मंत्री ही इतने लापरवाह होंगे तो सरकार कैसे काम करेगी, यह सोचने वाली बात है। निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री लंबे समय से मंत्रियों की इस प्रवृत्ति पर गौर कर रहे होंगे, तभी उन्हें नाराजगी व्यक्त करने पर मजबूर होना पड़ा और उन्होंने सांसदों-मंत्रियों को कठोर शब्दों में हिदायत दी। संसद में तमाम महत्त्वपूर्ण विषयों पर चर्चा, बहस, सवाल-जवाब होते हैं। ऐसे में मंत्रियों की मौजूदगी अपरिहार्य हो जाती है। लेकिन कई मंत्री इस हकीकत को जानते-बूझते भी सदन की उपेक्षा कर जाते हैं। इस बार प्रधानमंत्री ने जैसा सख्त रुख दिखाया है, उस के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि मंत्रियों को अपनी जिम्मेदारी का अहसास होगा।

ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री ने जनप्रतिनिधियों को सदन में मौजूद रहने के लिए पहली बार ही हिदायत दी है। पिछले पांच साल में प्रधानमंत्री जनप्रतिनिधियों को उनकी जिम्मेदारियों और कर्तव्यों के बारे में कई बार याद दिला चुके हैं। लेकिन दुख की बात है कि प्रधानमंत्री तक को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। यही वजह है कि उन्होंने अबकी बार सांसदों को भी दो-टूक संदेश दिया है कि उनका काम केवल राजनीति करना नहीं है बल्कि वे अपने क्षेत्रों में जाकर विकास और सामाजिक कार्यों से सक्रियता से जुड़ें। अक्सर ऐसी शिकायतें आती रहती हैं कि चुनाव के बाद ज्यादातर सांसद अपने इलाकों का मुंह तक नहीं देखते। ऐसे में सवाल यही उठता है कि जनप्रतिनिधि आखिर जनता के प्रति जवाबदेह कैसे बनेंगे? कैसे जनता की आवाज को, उसकी समस्याओं को सदन तक पहुंचाएंगे? जनप्रतिनिधियों को जनता और प्रशासन के बीच सेतु का काम करना चाहिए। लेकिन व्यवहार में ऐसा देखने को मिल नहीं रहा। ऐसे में प्रधानमंत्री की बात को अनसुना नहीं किया जाना चाहिए और जनप्रतिनिधियों को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए।

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