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संपादकीयः असुरक्षित सफर

रात दिल्ली-रांची राजधानी एक्सप्रेस में सफर करने वाली एक छात्रा शायद इस बात से आश्वस्त रही होगी कि इस स्तर की ट्रेन में जाना सुरक्षित है और उसके साथ किसी तरह की आपराधिक घटना नहीं होगी।

आए दिन ट्रेनों में होने वाली लूटपाट और छेड़छाड़ की घटनाएं कोई छिपी बात नहीं हैं। जब भी इस तरह की घटना सुर्खियों में आती है तब रेल महकमा एक रटा-रटाया आश्वासन जारी करता है कि वह भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए पर्याप्त कदम उठाएगा।

भारतीय रेलगाड़ियों में असुरक्षित सफर को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। पर ऐसा लगता है कि रेल महकमे के लिए ये सवाल कोई खास अहमियत नहीं रखते। वरना यह कैसे हो पाता कि चलती ट्रेनों में आपराधिक तत्त्व लूटपाट से लेकर महिलाओं से छेड़छाड़ की वारदात को अंजाम देते ही रहे हैं और अब खुद रेलवे के कर्मचारी भी ऐसी घटनाओं में लिप्त होने लगे हैं। जबकि किसी आपराधिक घटना के दौरान यात्रियों को उम्मीद होती है कि ट्रेन में मौजूद रेलवे के कर्मचारी उनकी मदद करेंगे। गौरतलब है कि मंगलवार की रात दिल्ली-रांची राजधानी एक्सप्रेस में सफर करने वाली एक छात्रा शायद इस बात से आश्वस्त रही होगी कि इस स्तर की ट्रेन में जाना सुरक्षित है और उसके साथ किसी तरह की आपराधिक घटना नहीं होगी। लेकिन इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि कोई महिला अपने खिलाफ अपराध होने की स्थिति में मदद के लिए जिस टीटीई को बुलाती, उसने खुद ही छात्रा के साथ आपराधिक हरकत की कोशिश की। सामने आई शिकायत के मुताबिक राजधानी एक्सप्रेस में सवार छात्रा को टीटीई और वेटर ने मिलीभगत कर खाने के लिए दी गई आइसक्रीम में कुछ नशीला पदार्थ मिला दिया और उससे छेड़छाड़ की कोशिश की।

इस मामले में ज्यादा अफसोसनाक यह है कि आरोपों के कठघरे में टीटीई और खाना परोसने वाला एक बैरा है। सवाल है कि इन दोनों की हरकतें किसी दूसरे अपराधी प्रवृत्ति वाले व्यक्ति से कितनी अलग हैं? इस तरह की घटना के बाद ट्रेन में सफर करने वाले यात्रियों के सामने एक बड़ा संकट यह खड़ा हो जाता है कि वे सामान्य अपराधियों और खुद रेलवे कर्मचारियों में कैसे फर्क करें, कैसे उनकी पहचान की जाए! खासतौर पर इसलिए भी कि दूसरी सामान्य ट्रेनों के मुकाबले राजधानी एक्सप्रेस जैसी ट्रेन से सफर को अपेक्षया ज्यादा सुविधाजनक और सुरक्षित माना जाता है। लेकिन अगर इन ट्रेनों में भी सफर कर रही महिलाओं के साथ ऐसी घटना होती है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि बाकी ट्रेनों में क्या हालत हो सकती है। इस घटना का एक पहलू ज्यादा चिंताजनक है कि ट्रेन में सफर करने वाले यात्रियों के खाने-पीने के सामान में खुद ट्रेन के टीटीई और बैरे की मिलीभगत से कोई नशीला पदार्थ मिलाया जा सकता है। अब कोई यात्री और खासतौर पर कोई महिला कैसे भरोसा करे कि राजधानी एक्सप्रेस के स्तर की ट्रेन में उसे दिया गया खाना सुरक्षित है?

आए दिन ट्रेनों में होने वाली लूटपाट और छेड़छाड़ की घटनाएं कोई छिपी बात नहीं हैं। जब भी इस तरह की घटना सुर्खियों में आती है तब रेल महकमा एक रटा-रटाया आश्वासन जारी करता है कि वह भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए पर्याप्त कदम उठाएगा। लेकिन इन आश्वासनों की हकीकत किसी से छिपी नहीं है। सुरक्षा-व्यवस्था चाक-चौबंद करने के नाम पर वसूले गए पैसे के बावजूद अगर आपराधिक तत्त्वों के साथ-साथ खुद ट्रेन कर्मचारी भी किसी महिला के सफर को असुरक्षित बनाने में लग जाएं तो ऐसे में क्या उपाय बचता है? यह समझना मुश्किल है कि एक ओर भारतीय रेल को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाने का दावा किया जाता है, बुलेट ट्रेन जैसी महंगी और महत्त्वांकाक्षी परियोजनाएं जमीन पर उतारने की कोशिश चल रही है, लेकिन मौजूदा व्यवस्था में यह सुनिश्चित करने की जरूरत प्राथमिक नहीं है कि यात्रियों का सफर कैसे सुरक्षित पूरा हो।

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