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संपादकीय: खतरे की घंटी

वातावरण का तापमान एक डिग्री बढ़ने से गेहूं की पैदावार साठ लाख टन तक घट सकती है। इस संकट का असर जिन राज्यों पर सबसे ज्यादा पड़ सकता है उनमें उत्तर प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल हैं।

Author January 22, 2019 5:04 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

आने वाले वक्त में दूध और कृषि उत्पादों के जिस घोर संकट का अंदेशा कृषि मंत्रालय ने जाहिर किया है, वह बड़ी चेतावनी है। कृषि मंत्रालय ने खेती, दूध उत्पादन और पशुपालन पर जलवायु संकट के प्रभाव का अध्ययन करवा कर संसदीय समिति को इसकी रिपोर्ट सौंपी थी। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से संबद्ध संसद की प्राक्कलन समिति ने अपने प्रतिवेदन में कृषि मंत्रालय की इस आकलन रिपोर्ट का जिक्र किया है। पिछले कुछ सालों में जिस तेजी से ऋतु-चक्र बदला है, उसका कृषि पर गंभीर असर पड़ा है। कृषि, पशुपालन और दूध उत्पादन तीनों ही एक-दूसरे से जुड़े हैं और मौसम परिवर्तन का इन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा, आबादी का बड़ा हिस्सा कृषि और पशुपालन पर ही निर्भर है, इसलिए यह चिंता और बढ़ जाती है। अगर खेती नहीं बचेगी तो किसान करेगा क्या, लोगों को अनाज कहां से मिलेगा, पशुधन नहीं बचेगा तो दूध कहां से आएगा? ये ऐसे सवाल हैं जो तत्काल ठोस समाधान की मांग रहे हैं।

कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु संकट के कारण खेती पर जो असर पड़ने वाले हैं, वे अगले दशक में दिखने लगेंगे। उदाहरण के लिए, 2020 तक चावल की पैदावार में चार से छह फीसद, मक्का में अठारह फीसद, आलू में ग्यारह फीसद और सरसों की पैदावार में दो फीसद तक की कमी आ सकती है। वातावरण का तापमान एक डिग्री बढ़ने से गेहूं की पैदावार साठ लाख टन तक घट सकती है। इस संकट का असर जिन राज्यों पर सबसे ज्यादा पड़ सकता है उनमें उत्तर प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल हैं। तापमान बढ़ने से इन राज्यों में पानी की कमी होगी और इसका सीधा असर पैदावार और पशुधन पर पड़ेगा। इससे दूध उत्पादन में भी भारी कमी आएगी। कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर तत्काल कदम नहीं उठाए गए तो 2020 तक दूध उत्पादन में 1.6 मीट्रिक टन की कमी आ सकती है और अगले तीन दशकों में यह संकट दस गुना बढ़ जाएगा। कृषि मंत्रालय की यह रिपोर्ट केंद्र और राज्यों की सरकारों के लिए खतरे की घंटी है।

जलवायु संकट बीसवीं सदी के अंधाधुंध विकास की देन है। इससे निपटने की दिशा में पिछले तीन-चार दशक में दुनिया के देश ज्यादा सचेत हुए हैं। हर साल वैश्विक स्तर पर जलवायु सम्मेलन हो रहे हैं और सारे देश इस विचार-विमर्श और संकल्प के साथ लौटते हैं कि वे जलवायु संकट के सबसे महत्त्वपूर्ण और जिम्मेदार कारक कार्बन उर्त्सजन को कम करने की दिशा में तेजी से काम करेंगे, ताकि धरती और वायुमंडल के तापमान को बढ़ने से रोका जा सके। लेकिन जलवायु संकट गहराता इसलिए जा रहा है कि इस दिशा में कोई भी देश ठोस कदम नहीं उठा रहा है। भारत और अन्य विकासशील देशों के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। बड़ी आबादी के लिए अनाज और दूध का बंदोबस्त करना आसान नहीं है। भारत का कृषि क्षेत्र और किसान पहले से ही गंभीर संकटों से जूझ रहे हैं। किसानों की आबादी का बड़ा हिस्सा गरीबी में जी रहा है और मुश्किल हालात में खेती करने को मजबूर है। सरकारों की ओर से कर्जमाफी के अलावा किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ठोस प्रयास होते नहीं दिख रहे। संसदीय समिति ने भी इस बात पर अप्रसन्नता जाहिर की है कि कृषि क्षेत्र को जलवायु संकट से बचाने के लिए जो कदम उठाने चाहिए, वे नहीं उठाए गए। ऐसे में कृषि और दूध उत्पादन के लिए अभी से कारगर रणनीति नहीं बनाई गई तो आने वाली पीढ़ियों पर इसका क्या असर पड़ेगा!

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