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बयान पर बवाल

अभी साध्वी निरंजन ज्योति के बयान पर भारतीय जनता पार्टी किरकिरी से उबरी भी नहीं थी कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के कोलकाता में दिए बयान को लेकर उसकी फजीहत शुरू हो गई है। शाह ने कोलकाता में कहा था कि सारदा चिटफंड घोटाले के पैसे का इस्तेमाल बर्दवान बम विस्फोटों के लिए किया गया। […]

Author December 8, 2014 11:20 am

अभी साध्वी निरंजन ज्योति के बयान पर भारतीय जनता पार्टी किरकिरी से उबरी भी नहीं थी कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के कोलकाता में दिए बयान को लेकर उसकी फजीहत शुरू हो गई है। शाह ने कोलकाता में कहा था कि सारदा चिटफंड घोटाले के पैसे का इस्तेमाल बर्दवान बम विस्फोटों के लिए किया गया। मगर बुधवार को कार्मिक राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने संसद में लिखित सफाई दी कि सारदा घोटाले की जांच चल रही है और अब तक ऐसे किसी लेनदेन का पता नहीं चला है कि इस पैसे से किसी आतंकी गतिविधि को मदद पहुंचाने की कोशिश की गई। अब भाजपा के वरिष्ठ नेता अपने पार्टी अध्यक्ष के बयान पर कुछ कहने से बचते फिर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में अपना जनाधार बढ़ाने की भाजपा की बेचैनी समझी जा सकती है। ममता बनर्जी के कामकाज को निशाने पर रखना भी समझा जा सकता है। मगर बगैर किसी पुख्ता प्रमाण के अमित शाह का यह कहना कि सारदा घोटाले का पैसा बांग्लादेश के आतंकवादी संगठन को भेजा गया, ज्यादा संगीन मामला है। इससे ममता बनर्जी के शासन की कमजोरी साबित होने के बजाय यह संकेत गया कि भारत भी आतंकवादी संगठनों को पोसता है। सारदा घोटाले की जांच चल रही है, उसमें तृणमूल कांग्रेस से जुड़े कुछ लोगों के नाम भी लिए जाते रहे हैं, मगर सच्चाई अभी सामने नहीं आई है। ऐसे में अमित शाह के अपने मन से कोई फैसला देने की कोई तुक नहीं थी। मगर जिस तरह वे आतंकवादी संगठनों की पहचान मुसलिम समुदाय से जोड़ कर हिंदू भावनाओं को भड़काने की कोशिश करते रहे हैं, उसी झोंक में उन्होंने बर्दवान बम विस्फोटों के तार सारदा घोटाले से जोड़ दिए। जाहिर है, इस तरह वे एक तीर से दो निशाने साधना चाहते थे- ममता सरकार की कारगुजारियां भी उजागर हों और हिंदुत्व का एजेंडा भी सध जाए।

यह पहली बार नहीं है, जब अमित शाह ने बगैर कुछ सोचे-समझे और नीतिगत पहलुओं का ध्यान रखे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की मंशा से ऐसा बयान दिया। मुजफ्फरनगर मामले में भी उन्होंने ऐसे ही बेबुनियाद बयान दिए थे। मगर पहले और बात थी, अब केंद्र में उनकी पार्टी की सरकार है और ऐसे आधारहीन बयानों से उसके लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। अब इस बात का क्या अर्थ लगाया जाना चाहिए कि सरकार को अमित शाह के बयान के उलट सफाई देनी पड़ रही है। क्या पार्टी और सरकार के बीच कोई तालमेल नहीं है? अमित शाह ने जो कुछ कहा क्या वह सब मनगढ़ंत था या वे सब बातें उन्हें सरकारी सूत्रों से पता चली थीं। राष्ट्रीय जांच एजेंसी को जांच न करने देने और पश्चिम बंगाल की तरफ से बर्दवान बम विस्फोटों के सबूत मिटाए जाने का दावा वे किस आधार पर कर गए, जबकि अभी तक आधिकारिक तौर पर ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं पेश की गई है। आतंकवाद का मामला संवेदनशील है, राजनीतिक जनाधार बढ़ाने के लिए इसे भुनाने की कोशिश खतरनाक साबित हो सकती है। यों भी पार्टी अध्यक्ष होने के नाते अमित शाह से अधिक जवाबदेही की उम्मीद की जाती है। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के जरिए जनाधार बनाने के प्रयास में पार्टी के कार्यकर्ता पहले ही मनमानियों पर उतरे नजर आने लगे हैं, अध्यक्ष के ऐसे बयान उन्हें अनुशासित बनाए रखने में मुश्किलें खड़ी करेंगे। किसी विपक्षी दल की सरकार के कामकाज पर अंगुली उठाने का तरीका यह नहीं होे सकता कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर ही सवाल खड़े कर दिए जाएं। स्वाभाविक ही विपक्षी दल अमित शाह से अपने बयान पर माफी मांगने का दबाव बना रहे हैं।

 

 

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