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नक्सली कहर

छत्तीसगढ़ में एक बार फिर नक्सली कहर ढाने में कामयाब हो गए। सोमवार की शाम घात लगा कर किए गए उनके हमले ने सीआरपीएफ के दो अफसरों और ग्यारह जवानों की जान ले ली। चौदह अन्य जवान जख्मी हैं, और खबर है कि इनमें से कई की हालत गंभीर है। विडंबना है कि यह घटना […]

Author Published on: December 3, 2014 1:11 PM

छत्तीसगढ़ में एक बार फिर नक्सली कहर ढाने में कामयाब हो गए। सोमवार की शाम घात लगा कर किए गए उनके हमले ने सीआरपीएफ के दो अफसरों और ग्यारह जवानों की जान ले ली। चौदह अन्य जवान जख्मी हैं, और खबर है कि इनमें से कई की हालत गंभीर है। विडंबना है कि यह घटना ऐसे समय हुई जब राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह पिछले कुछ महीनों में नक्सलियों के आत्मसमर्पण का हवाला देते हुए उनकी ताकत चुक जाने के दावे कर रहे थे। इस घटना से एक दिन पहले भी उन्होंने कहा था कि वह दिन दूर नहीं, जब छत्तीसगढ़ को नक्सलियों से पूरी तरह निजात मिल जाएगी। इस तरह का दावा नया नहीं है। इस साल मार्च में भी छत्तीसगढ़ में माओवादियों ने सीआरपीएफ के ग्यारह और स्थानीय पुलिस के चार जवानों की जान ले ली थी। उसके पहले भी नक्सलियों के कमजोर पड़ जाने की बात कही जा रही थी। एक बार फिर वैसे ही दावे दोहराए गए।

हो सकता है नक्सली किसी हद तक कमजोर हुए हों, लेकिन वे इतने भी कमजोर नहीं हुए हैं कि उन्हें लेकर निश्चिंत हुआ जा सके। ताजा हमले से यह बात एक बार फिर पुष्ट हुई है कि उनकी सक्रियता बनी हुई है और वे अपने किसी षड्यंत्र को अंजाम दे सकते हैं। उन्हें हताशा में मान कर अपनी पीठ थपथपाने के बजाय राज्य सरकार को अधिक सतर्क रहना चाहिए था। नक्सली जब खुद को हताश महसूस करते हैं तब भी अपनी किसी योजना को अंजाम देने की फिराक में रहते हैं ताकि यह बता सकें कि वे कमजोर नहीं पड़े हैं। हैरत की बात है कि बहुत बार के इस अनुभव के बावजूद पर्याप्त सावधानी नहीं बरती गई। नक्सलियों ने सीआरपीएफ की टुकड़ी पर उस वक्त हमला किया जब वह उनके खिलाफ खोज-अभियान से लौट रही थी।

हमलावरों ने घात लगा कर तो धावा बोला ही, स्थानीय ग्रामीणों को ढाल के तौर पर इस्तेमाल किया। जबकि वे आदिवासियों के पक्ष में लड़ने का दम भरते हैं! बहरहाल, इस घटना से एक बार फिर नक्सल विरोधी अभियान की कई खामियां उजागर हुई हैं। यह हमला राज्य की सुकमा घाटी में हुआ, जो कि नक्सलियों का गढ़ रही है। इस इलाके में वे पहले भी कई बार सुरक्षाकर्मियों और दूसरे लोगों को निशाना बना चुके हैं। लेकिन ऐसे क्षेत्र में भी उन्हें तलाशने गई सीआरपीएफ टीम के पास सूचनाओं की कमी थी, जो कि ऐसे किसी अभियान की सफलता के लिए एक बुनियादी शर्त है।

दूसरी तरफ, ऐसा लगता है कि हमलावरों को सीआरपीएफ के उस दस्ते की गतिविधि की पल-पल की जानकारी थी। उन्हें यों भी अपनी सक्रियता वाले क्षेत्र के चप्पे-चप्पे का पता होता है, और स्थानीय लोगों से उनका संपर्क भी उनकी मंशा पूरी करने के काम आता है। जबकि सीआरपीएफ स्थानीय परिस्थितियों और भूगोल से इतना वाकिफ नहीं होती, न स्थानीय लोगों से उसका कोई संपर्क होता है। इसके लिए वह पुलिस पर निर्भर होती है। मगर पुलिस की छवि लोगों का भरोसा जीतने के बजाय उन्हें डराने वाली रही है, और इसका नुकसान नक्सल विरोधी अभियान में भी हुआ है। लेकिन शायद ही कभी केंद्र और राज्य की सरकारें और सुरक्षा तंत्र इस पहलू को लेकर चिंतित नजर आए हों। जब भी नक्सल विरोधी अभियान को तेज करना होता है तो अमूमन सीआरपीएफ की तैनाती बढ़ा दी जाती है। पर यह काफी नहीं है। पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री ने गुवाहाटी में राज्यों के पुलिस महानिदेशकों को संबोधित करते हुए पुलिस को ‘स्मार्ट’ बनाने की वकालत की, पर पुलिस के लिए स्थानीय लोगों से भरोसे और सहयोग का रिश्ता बनाना भी जरूरी है।

 

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