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संपादकीय: उत्पीड़न पर निगरानी

विशाखा दिशा-निर्देश के मुताबिक दफ्तरों में समय-समय पर कार्यशालाएं आयोजित कर महिलाओं को उनके अधिकारों और कार्यस्थल पर सुरक्षा आदि को लेकर जागरूक बनाने के साथ-साथ पुरुष मानसिकता को भी बदलने के प्रयास जरूरी हैं।

Author October 26, 2018 2:01 AM
प्रतीकात्मक फोटो

कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न पर रोक लगाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर विशाखा दिशा-निर्देश लागू किए गए। इनके तहत कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का प्रावधान है। हर कार्यालय में, चाहे वह सरकारी हो या निजी क्षेत्र का, एक समिति का गठन जरूरी है, जो महिला उत्पीड़न संबंधी शिकायतों की जांच और फिर उस पर उचित कार्रवाई का निर्णय करेगी। इस समिति में आधी संख्या महिला सदस्यों की होना अनिवार्य है। इसके बावजूद कार्यस्थलों पर महिलाओं का उत्पीड़न बंद नहीं हुआ है। पिछले दिनों चले मीटू अभियान से जाहिर हुआ कि किस कदर महिलाएं कार्यस्थलों पर उत्पीड़ित होती हैं। इसी के मद्देनजर केंद्र सरकार ने एक मंत्री समूह गठित किया है, जो कार्यस्थलों पर महिलाओं का उत्पीड़न रोकने संबंधी उपायों पर निगरानी रखेगा। इस समूह में केंद्रीय गृहमंत्री, रक्षा मंत्री और महिला एवं बाल कल्याण मंत्री शामिल हैं। निस्संदेह यह एक सराहनीय कदम है। इससे उन कार्यालयों में भी महिला उत्पीड़न संबंधी शिकायतें सुनने वाली समिति के गठन की उम्मीद बनी है, जो अब तक इसकी अनदेखी करते रहे हैं। मगर वास्तव में इससे महिला उत्पीड़न की प्रवृत्ति पर कितनी लगाम लग पाएगी, दावा करना मुश्किल है।

दरअसल, कार्यस्थलों पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न उस पुरुष मानसिकता की देन है, जो महिलाओं को वस्तु मानती है। वह उन्हें अपनी बराबर की सहकर्मी के रूप में देख ही नहीं पाती। यह मानसिकता समाज में भी है और वहीं से दफ्तरों में पहुंचती है। पर विशाखा दिशा-निर्देश के जरिए इस मानसिकता पर कुछ अंकुश लगाने का भरोसा जरूर जगता है। विशाखा दिशा-निर्देश के मुताबिक दफ्तरों में समय-समय पर कार्यशालाएं आयोजित कर महिलाओं को उनके अधिकारों और कार्यस्थल पर सुरक्षा आदि को लेकर जागरूक बनाने के साथ-साथ पुरुष मानसिकता को भी बदलने के प्रयास जरूरी हैं। पर अभी तक इस दिशा में अपेक्षित सक्रियता नजर नहीं आती। इसकी कई वजहें हैं। एक तो यह कि बहुत सारी महिलाएं अपने खिलाफ होने वाली छेड़छाड़ जैसी घटनाओं को नजरअंदाज कर देती या उनसे अपने स्तर पर ही निपट लेती हैं, शिकायत दर्ज नहीं करातीं। कई महिलाएं इन पर चुप्पी साध जाती हैं। जो अनुबंध आधार पर काम करती हैं, उन्हें नौकरी खोने का डर सताता है, इसलिए वे अपने वरिष्ठ कर्मियों के खिलाफ कोई कड़ा कदम उठाने से बचती हैं। फिर अगर कोई शिकायत आती भी है, तो कार्यालयों में अधिकारीगण या सहकर्मी समझा-बुझा कर ऐसे मामलों को रफा-दफा करने का प्रयास करते हैं। कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होती। इस तरह इस प्रवृत्ति पर पूरी तरह अंकुश लगाना कठिन बना हुआ है।

केंद्र सरकार द्वारा गठित मंत्री समूह के सामने भी यह चुनौती रहेगी कि किस तरह इस पुरुष मानसिकता को बदला जाए। जब तक यह मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक महिलाओं के यौन उत्पीड़न के किसी भी तरह के मामले पर रोक लगाना मुश्किल होगा। इसके अलावा इसका दूसरा पहलू भी कुछ मामलों में देखा गया है, जब किसी महिला ने निजी लाभ के लिए या फिर किसी रंजिश के चलते किसी पुरुष पर उत्पीड़न का झूठा आरोप लगाया। हालांकि ऐसे मामले बहुत कम हैं, पर उदाहरण के रूप में मौजूद तो हैं ही। इसलिए कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न का मामला कानूनी दृष्टि से थोड़ा पेचीदा बन जाता है। इसलिए केंद्रीय समिति ऐसे मसलों पर पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से कार्रवाई सुनिश्चित करने के क्या उपाय निकालती और विशाखा दिशा-निर्देश को प्रभावी बनाने के लिए क्या कदम उठाती है, देखने की बात है।

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