मंगल की मंजिल

जनसत्ता 25 सितंबर, 2014: यह शायद दोहराने की जरूरत नहीं कि भारत के मंगल अभियान की शानदार कामयाबी अब इतिहास के पन्नों पर सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो चुकी है। इस अभियान की सफलता देश की एक बड़ी उपलब्धि है। मंगल मिशन के सपने को सच करने की खातिर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के हमारे […]

जनसत्ता 25 सितंबर, 2014: यह शायद दोहराने की जरूरत नहीं कि भारत के मंगल अभियान की शानदार कामयाबी अब इतिहास के पन्नों पर सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो चुकी है। इस अभियान की सफलता देश की एक बड़ी उपलब्धि है। मंगल मिशन के सपने को सच करने की खातिर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के हमारे वैज्ञानिकों ने अपनी तमाम ऊर्जा और क्षमता झोंक दी, और इसके लिए उनकी जितनी भी प्रशंसा की जाए, कम होगी। बुधवार को सुबह लगभग आठ बजे इसरो के मार्स आॅर्बिटर मिशन, यानी मंगलयान के मंगल की कक्षा में प्रवेश करते ही भारत दुनिया का पहला ऐसा देश बन गया है, जिसने अपनी पहली ही कोशिश में यह कामयाबी हासिल की है। इससे पहले अमेरिका, रूस और यूरोपीय संघ अपने मंगल अभियानों में सफल हो चुके हैं, लेकिन कई-कई प्रयासों के बाद। अमेरिका को तो मंगल तक पहुंचने के लिए सात बार कोशिश करनी पड़ी थी। पर यह नहीं भूलना चाहिए कि तब से अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में और प्रगति हुई है। उन सब अनुभवों से जिस तरह दूसरे देशों की अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थाओं ने सीखा होगा, उसी तरह इसरो ने भी। चंद्रमिशन के बाद अब मंगल मिशन के मंजिल तक पहुंचने से अंतरिक्ष अभियानों के क्षेत्र में भारत की हैसियत काफी बढ़ गई है। करीब पचास साल पहले केरल के थुंबा अंतरिक्ष केंद्र से छोड़े गए पहले रॉकेट से शुरू हुए सफर का यह नया अध्याय है। गौरतलब है कि पोलर सेटेलाइट लॉन्च वीकल सी-25 की मदद से मंगलयान को पिछले साल पांच नवंबर को श्रीहरिकोटा अंतरिक्ष केंद्र से रवाना किया गया था और वह सफलतापूर्वक एक दिसंबर को पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण-सीमा से बाहर निकल गया था।

मंगलयान के लिए तय कामों में मंगल ग्रह पर जीवन के लिए संभावित संकेत मीथेन यानी मार्श गैस के सूत्र का पता लगाने के अलावा वहां के पर्यावरण की जांच शामिल है। इसमें लगाए गए कैमरे थर्मल इमेजिंग स्पेक्ट्रोमीटर लाल ग्रह की सतह और उसमें मौजूद खनिज संपदा का अध्ययन कर आंकड़े जमा करेंगे। मंगल ग्रह के अध्ययन और वहां से आंकड़े जुटाने में सात अमेरिकी मिशन काम कर रहे हैं। वैज्ञानिक अध्ययन और उपलब्धियां किसी भी देश की हों, वे भविष्य के प्रयोगों में सबके काम आती हैं। जिस तरह अमेरिका के नासा की उपलब्धियों ने दुनिया भर के अंतरिक्ष अनुसंधान को आगे बढ़ने में मदद की है, उसी तरह इसरो की कामयाबी भी सिर्फ भारत के लिए मायने नहीं रखती, भले उसे व्यवसाय के मोर्चे पर भी बड़ा फायदा हो। संभव है कि कई देश अपने अंतरिक्ष यानों के प्रक्षेपण के लिए भारत की ओर रुख करें।

कुछ मामलों में दूसरे देशों से मदद लेने के बावजूद भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम काफी हद तक स्वदेशी और तुलनात्मक रूप से किफायती है। यह इस अभियान की एक और बड़ी खासियत है कि अमेरिका और रूस ने जहां अपने मंगल अभियानों के लिए काफी बड़े और महंगे रॉकेटों का प्रयोग किया, वहां भारत के इस अभियान पर महज साढ़े चार सौ करोड़ रुपए की लागत आई। जाहिर है, हमारे वैज्ञानिकों के सामने अपने इस अभियान के लिए जितनी भी संभावनाएं थीं, उसमें उन्होंने सबसे बेहतर और कम खर्चीले विकल्पों के साथ प्रयोगों के जरिए कामयाबी की कहानी रची। सवाल है कि इस रचनात्मकता, प्रयोगशीलता और प्रतिबद्धता का दायरा देश में विज्ञान शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती आदि क्षेत्रों तक क्यों नहीं फैलता दिखता? इसरो जैसा उद्यम अन्य वैज्ञानिक संस्थाओं में क्यों नजर नहीं आता? इस ऐतिहासिक दिन के गर्व-बोध के साथ इन सवालों पर भी हमें सोचना चाहिए।

 

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