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जनसत्ता 22 सितंबर, 2014: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले हफ्ते देश के मुसलमानों के बारे में जो कहा वह स्वागत-योग्य है। कई मुसलिम संगठनों और धर्मगुरुओं ने इसका स्वागत किया भी है। लेकिन उनके बयान को लेकर कई सवाल भी उठे हैं। पिछले हफ्ते एक टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में मोदी ने कहा कि […]

Author September 23, 2014 10:38 AM

जनसत्ता 22 सितंबर, 2014: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले हफ्ते देश के मुसलमानों के बारे में जो कहा वह स्वागत-योग्य है। कई मुसलिम संगठनों और धर्मगुरुओं ने इसका स्वागत किया भी है। लेकिन उनके बयान को लेकर कई सवाल भी उठे हैं। पिछले हफ्ते एक टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में मोदी ने कहा कि भारतीय मुसलमान देशभक्त हैं; वे देश के लिए जिएंगे और देश के लिए ही मरेंगे; वे भारत का बुरा नहीं सोच सकते। बहुतों को मोदी का ऐसा कहना अप्रत्याशित लगा होगा। एक तो इसलिए कि गुजरात दंगों के समय से मोदी की खुद की छवि मुसलिम समुदाय को आशंकित करती रही है। दूसरे, भाजपा जैसी राजनीति करती आई है, उसमें इस तरह की बात असंगत मालूम पड़ती है। भाजपा समेत समूचे संघ परिवार का रवैया राष्ट्र के प्रति मुसलिम समुदाय की निष्ठा को संदिग्ध बताने वाला रहा है। इससे उलट मोदी का बयान साहसिक ही कहा जाएगा। पर सवाल है, क्या यह उनका स्थायी रुख है? क्या वे यह भरोसा दिला सकते हैं कि उनकी सरकार और पार्टी की यही नीति होगी? क्या संघ परिवार अपनी पुरानी फितरत से बाज आएगा? मोदी ने यह टिप्पणी तब की, जब उनसे अलकायदा की नई धमकी के बारे में पूछा गया। कुछ दिन पहले अलकायदा के सरगना अल जवाहिरी ने भारत को निशाना बना कर अपनी नई शाखा गठित करने का एलान किया था।
अगर इस खतरे से निपटने के लिए प्रधानमंत्री मुसलिम समुदाय को सहयोग के लिए प्रेरित करना चाहते हैं तो यह स्वाभाविक है और जरूरी भी। मोदी को कुछ ही दिनों में अमेरिका जाना है। संभवत: इस यात्रा से पहले उन्होंने दुनिया को यह संदेश देना चाहा हो कि उन्हें पुराने चश्मे से न देखा जाए। कई लोगों ने उनके बयान को उपचुनावों में भाजपा की करारी शिकस्त से भी जोड़ कर देखा है, यानी भाजपा को यह डर सता रहा होगा कि आगामी विधानसभा चुनावों में कहीं मुसलिम मतदाता उसके खिलाफ एकजुट मतदान न करें! जो हो, अगर मोदी इसी तरह से सोचते हैं, जैसा कि उन्होंने बीते सप्ताह दिए साक्षात्कार में कहा, तो सवाल है कि लोकसभा चुनाव में भाजपा के उम्मीदवारों में मुसलिम क्यों नहीं थे? बस शाहनवाज हुसैन अपवाद थे। मोदी सरकार में भी सिर्फ एक मुसलिम को जगह मिल पाई है। गुजरात के पिछले विधानसभा चुनाव में, जब मोदी वहां के मुख्यमंत्री थे, भाजपा के उम्मीदवारों में एक भी मुसलिम नहीं था, जबकि सारे टिकट मोदी की मर्जी से ही बंटे थे। अगर मान लें राष्ट्रीय जनादेश मिलने के बाद मोदी का मन बदल गया है तो यही कहना होगा कि देर आयद दुरुस्त आयद। पर क्या वे आश्वस्त कर सकते हैं कि उनकी सरकार और पार्टी की यही दिशा होगी? क्या संघ परिवार को वह मान्य होगा?
‘लव जिहाद’ के विरोध के बहाने मुसलिम-विरोधी अभियान पर मोदी चुप्पी साधे रहे हैं। एक तरफ वे मुसलमानों को देश के प्रति वफादार बता रहे हैं और दूसरी तरफ उनकी पार्टी में ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो मुसलिम समुदाय के खिलाफ आग उगलने का कोई मौका नहीं छोड़ते। हाल में योगी आदित्यनाथ ने उन्हें दंगाई करार दिया और साक्षी महाराज ने कहा कि मदरसों में आतंकवाद की पढ़ाई होती है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि आखिर भाजपा की रीति-नीति क्या है? मोदी ने जो कहा है, अगर पार्टी भी उसी में विश्वास करती है तो उसने योगी आदित्यनाथ, साक्षी महाराज समेत नफरत भरे बयान देने वाले अपने लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई की? केंद्रीय गृह मंत्रालय क्यों इन मामलों में खामोश रहा है? मोदी अब जो कह रहे हैं, अगर उसके प्रति वे संजीदा हैं, तो क्या मुसलमानों के खिलाफ विद्वेष भड़काने का सिलसिला बंद होगा और उनके प्रति बराबरी का व्यवहार होगा!

 

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