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योजना का तंत्र

रविवार को प्रधानमंत्री के साथ हुई मुख्यमंत्रियों की बैठक एक खास सवाल पर केंद्रित थी, यह कि योजना आयोग की भावी भूमिका और स्वरूप क्या हो। बैठक प्रधानमंत्री ने बुलाई थी, जो कि आयोग की विदाई तय कर चुके हैं। पर उसकी जगह वैकल्पिक व्यवस्था क्या होगी, यह अभी तय नहीं हो सका है। योजना […]

Author December 9, 2014 12:11 PM

रविवार को प्रधानमंत्री के साथ हुई मुख्यमंत्रियों की बैठक एक खास सवाल पर केंद्रित थी, यह कि योजना आयोग की भावी भूमिका और स्वरूप क्या हो। बैठक प्रधानमंत्री ने बुलाई थी, जो कि आयोग की विदाई तय कर चुके हैं। पर उसकी जगह वैकल्पिक व्यवस्था क्या होगी, यह अभी तय नहीं हो सका है। योजना आयोग की स्थापना 1950 में हुई थी। तब से योजनागत विचार-विमर्श, नीति-निर्माण और योजनाओं के लिए आबंटन आदि में इसकी केंद्रीय भूमिका रही है। लेकिन देश में उदारीकरण की शुरुआत के बाद से आयोग की भूमिका को फिर से परिभाषित करने की मांग जब-तब उठती रही है। आलोचकों का मानना है कि आयोग की स्थापना सोवियत मॉडल के आकर्षण के दिनों में हुई थी और अब यह प्रासंगिक नहीं रह गया है; आर्थिक सुधारों के इस दौर में इसे प्रासंगिक बनाने के लिए इसका कायाकल्प करना होगा। प्रधानमंत्री ने इसी सोच पर अपनी मुहर लगाई, जब स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए योजना आयोग की जगह उन्होंने एक वैकल्पिक व्यवस्था बनाने का एलान किया। मुख्यमंत्रियों के साथ हुई उनकी बैठक में इस बारे में आम सहमति नहीं दिखी।

पंचवर्षीय योजना का ढर्रा चलने दिया जाए या नहीं, इस पर भी मतैक्य नहीं था। भाजपा और राजग शासित प्रदेशों और तमिलनाडु, तेलंगाना जैसे राज्यों के मुख्यमंत्री जहां वैकल्पिक व्यवस्था के प्रधानमंत्री के प्रस्ताव के पक्ष में हैं, वहीं कांग्रेस का कहना है कि योजना आयोग को खत्म करने के बजाय उसे ही और विकसित किया जाए। जनता दल (एकी) और तृणमूल कांग्रेस जैसे दल भी योजना आयोग को समाप्त करने के पक्ष में नहीं हैं। कहा जा सकता है कि ये दृष्टिकोण राजनीतिक लकीर पर बंटे हुए हैं। भाजपा या राजग शासित राज्यों के मुख्यमंत्री हर हाल में मोदी के प्रस्ताव के साथ रहेंगे, वहीं कांग्रेस को यह रास नहीं आ सकता कि जवाहरलाल नेहरू की स्थापित की हुई यह संस्था इतिहास की चीज हो जाए। पर इस विचार-विमर्श को लेकर एक अहम सवाल यह उठता है कि मुख्यमंत्रियों के साथ बातचीत क्या महज एक औपचारिकता है? तेरह अगस्त को ही मंत्रिमंडल की बैठक में योजना आयोग को समाप्त करने का निर्णय कर लिया गया था। फिर पंद्रह अगस्त को प्रधानमंत्री ने लाल किले से इसकी घोषणा भी कर दी। यानी केंद्र सरकार को अपनी मंशा के अनुरूप जो तय करना था वह कर चुकी है, अब राज्य सरकारों को आयोग के वजूद पर नहीं, सिर्फ प्रस्तावित व्यवस्था के बारे में सुझाव देने हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा है कि जो नई व्यवस्था बनेगी उसमें राज्यों को अपनी राय देने के लिए पहले से ज्यादा गुंजाइश रहेगी और इससे संघीय व्यवस्था मजबूत होगी। पर आयोग के बारे में निर्णय पर पहुंचने से पहले राज्यों का रुख जानना उन्हें जरूरी नहीं लगा। योजना आयोग की उत्तराधिकारी संस्था का नाम अभी तय नहीं है, पर उसके काम के बारे में कुछ संकेत प्रधानमंत्री ने दिए हैं। नई व्यवस्था में मुख्यमंत्रियों को भी प्रतिनिधित्व देने और केंद्रीय आबंटन पर राज्यों की निर्भरता घटाने के प्रस्ताव सराहनीय हैं। मगर प्रस्तावित निकाय गैर-सरकारी शोध संस्थानों को भी नीति-निर्माण की प्रक्रिया में शामिल करेगा, जैसा कि अमेरिका में होता है। योजना बनाते समय सरकार से बाहर होने वाली आर्थिक गतिविधियों को भी समाहित करने पर उसका जोर होगा। इस तरह के संकेतों के चलते बहुत-से लोगों को अंदेशा है कि कहीं यह सरकारी योजनाओं की दिशा तय करने और योजनागत आबंटनों में निजी क्षेत्र की दखलंदाजी का रास्ता साफ करने की कवायद तो नहीं है! इसलिए हैरत की बात नहीं कि प्रस्तावित संस्था को लेकर एक तरफ उत्सुकता और उम्मीद है, तो दूसरी तरफ डर भी पैदा हुआ है।

 

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