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घाटे का अर्थ

हालांकि अर्थव्यवस्था को लेकर इस वक्त कई सकारात्मक बातें कही जा सकती हैं। मसलन, महंगाई का ग्राफ नीचे आया है, शेयर बाजार रिकार्ड ऊंचाई पर है और डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत में स्थिरता बनी हुई है। लेकिन कई चिंताजनक संकेत भी उभरे हैं। जिस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आस्ट्रेलिया में भारतीय अर्थव्यवस्था की […]

Author Published on: November 19, 2014 1:29 AM

हालांकि अर्थव्यवस्था को लेकर इस वक्त कई सकारात्मक बातें कही जा सकती हैं। मसलन, महंगाई का ग्राफ नीचे आया है, शेयर बाजार रिकार्ड ऊंचाई पर है और डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत में स्थिरता बनी हुई है। लेकिन कई चिंताजनक संकेत भी उभरे हैं। जिस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आस्ट्रेलिया में भारतीय अर्थव्यवस्था की बाबत सब कुछ ठीकठाक होने का भरोसा दिला रहे थे, उसी दिन देश का निर्यात लुढ़कने की खबर आई। मौजूदा वित्तवर्ष में पहली बार निर्यात में गिरावट दर्ज हुई है, वह भी ऐसे समय जब मोदी सरकार ने इसे बढ़ाने के लिए ‘मेक इन इंडिया’ समेत कई कदम उठाए हैं। निर्यात पिछले सात महीनों में सबसे निचले स्तर पर है। वाणिज्य मंत्रालय की ओर से जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक इस साल अक्तूबर में निर्यात पिछले साल के इसी महीने के मुकाबले पांच फीसद कम रहा। जिन उद्योगों में भारत अग्रणी रहा है, उनके उत्पादों के निर्यात में भी कमी दर्ज हुई है, मसलन दवाओं और रत्न-आभूषण आदि में। दूसरी ओर, अक्तूबर में आयात में पिछले साल के इसी माह की तुलना में साढ़े तीन फीसद से ज्यादा का इजाफा हुआ।

निर्यात में वृद्धि और आयात में बढ़ोतरी ने व्यापार घाटा बढ़ा दिया है। पिछले साल अक्तूबर में व्यापार घाटा 10.59 अरब डॉलर था, यह इस साल के अक्तूबर में बढ़ कर 13.35 अरब डॉलर पर पहुंच गया। भारत के आयात-मद का बड़ा हिस्सा तेल का होता है। कुछ महीनों से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी रही है। अगर यह राहत न होती तो आयात-निर्यात की खाई और चौड़ी होती। जानकार मानते हैं कि कच्चे तेल में राहत अस्थायी है और कभी भी इसकी कीमतें चढ़ना शुरू कर सकती हैं। तब उसका असर जहां आयात का बिल बढ़ने में होगा, वहीं महंगाई के मोर्चे पर महसूस किया जा रहा सुकून भी छिन जा सकता है। फिलहाल व्यापार घाटा बढ़ने का सबसे प्रमुख कारण सोने के आयात में आया उछाल है। इस साल अक्तूबर में सोने के आयात में दो सौ अस्सी फीसद की भारी वृद्धि दर्ज हुई है। यों भारतीय समाज में स्वर्ण-खरीद की ललक अन्य देशों के मुकाबले हमेशा अधिक रही है और उसे निवेश का एक आकर्षक जरिया मानने का रुझान भी बढ़ता गया है। लेकिन सोने के आयात में हालिया बढ़ोतरी चौंकाने वाली है। कई जानकारों का मानना है कि जिन लोगों का काला धन बाहर जमा है, वे अब उसे सोने के रूप में मंगा रहे हैं। क्या उन्हें बच निकलने का रास्ता दिया जा रहा है?

अब बढ़ते व्यापार घाटे से चिंतित सरकार और रिजर्व बैंक सोने के आयात पर कुछ अंकुश लगाने के बारे में सोच रहे हैं, मगर इस हैरतअंगेज आयात की तह में जाने की जरूरत उन्हें क्यों नहीं महसूस हुई? पिछले साल अगस्त में रिजर्व बैंक ने स्वर्ण-आयात को लेकर कड़ी बंदिशें लगाई थीं, पर बाद में चालू खाते के घाटे में सुधार होते देख इसमें ढील दे दी गई। पर इसकी कोई जरूरत नहीं थी। सोने की बढ़ती खरीद हमारी अर्थव्यवस्था के लिए कोई शुभ संकेत नहीं है, क्योंकि इससे ऐसे निवेश को बढ़ावा मिलता है जो उत्पादक नहीं होता। हर साल देश की डीजीपी के तीन फीसद के बराबर धन सोने के रूप में अनुत्पादक पूंजी में बदल रहा है। स्वर्ण आयात में उन्हीं लोगों की दिलचस्पी हो सकती है जिनके पास बेहिसाब पैसा है, पर इस आयात के चलते देश के व्यापार घाटे को पाटने की कोशिशें हमेशा नाकाम होती रहती हैं और इसकी कीमत सभी को चुकानी पड़ती है।

 

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