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मनमानी के वाहन

दिल्ली में एक युवती के साथ रेडियो टैक्सी चालक द्वारा बलात्कार की घटना से न सिर्फ रेडियो टैक्सियों की विश्वसनीयता पर अंगुलियां उठने लगी हैं, बल्कि दिल्ली पुलिस के सुरक्षा संबंधी दावों की भी कलई खुल गई है। हालांकि दिल्ली परिवहन निगम ने संबंधित रेडियो टैक्सी कंपनी के संचालन पर रोक लगा दी है, मगर […]

दिल्ली में एक युवती के साथ रेडियो टैक्सी चालक द्वारा बलात्कार की घटना से न सिर्फ रेडियो टैक्सियों की विश्वसनीयता पर अंगुलियां उठने लगी हैं, बल्कि दिल्ली पुलिस के सुरक्षा संबंधी दावों की भी कलई खुल गई है। हालांकि दिल्ली परिवहन निगम ने संबंधित रेडियो टैक्सी कंपनी के संचालन पर रोक लगा दी है, मगर इतने भर से उसकी जवाबदेही पूरी नहीं हो जाती। परिवहन विभाग का कहना है कि उबर नाम की कंपनी ने रेडियो टैक्सी चलाने के लिए जरूरी लाइसेंस हासिल नहीं किया था। मगर सवाल है कि अभी उसका इस तरफ ध्यान क्यों गया? उधर उबर कंपनी के प्रबंधकों का कहना है कि भारत में टैक्सी ड्राइवरों की जांच का तंत्र इतना लचर है कि उनके चाल-चलन के बारे में सही-सही पता लगाना कठिन है। जिस चालक को बलात्कार का दोषी पाया गया, उसे दिल्ली पुलिस के एक आयुक्त कार्यालय से चरित्र प्रमाण-पत्र जारी किया गया था, जबकि यही चालक तीन साल पहले बलात्कार के आरोप में सात महीने की सजा काट चुका है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि दो साल पहले एक बस में हुए दुराचार और फिर युवती की नृशंस हत्या को लेकर उठे देशव्यापी आक्रोश के बाद दिल्ली पुलिस सार्वजनिक वाहनों में सुरक्षा इंतजाम करने को लेकर कितनी मुस्तैद हो पाई है।

यों रेडियो टैक्सी का कारोबार करने वाली कंपनियों का दावा है कि उनमें सफर करना सबसे सुरक्षित है। उनमें लगे जीपीएस के जरिए गाड़ियों के संचालन पर लगातार नजर रखी जाती है। उनके चालक मुसाफिरों के साथ किसी तरह की बदसलूकी या मनमानी नहीं कर सकते। मगर उबर कंपनी के टैक्सी चालक की करतूतों से जाहिर हो चुका है कि ये दावे कितने खोखले हैं। दरअसल, रेडियो टैक्सी का कारोबार करने वाली कंपनियां स्थानीय टैक्सी चालकों का पंजीकरण करती हैं और उन्हीं के जरिए अपनी सेवाएं संचालित करती हैं। यों वे पंजीकरण कराने वाले टैक्सी चालकों से ड्राइविंग लाइसेंस, अनुभव संबंधी जानकारी और उनके चाल-चलन आदि के बारे में पता लगाने के लिए दिल्ली पुलिस से सत्यापित चरित्र प्रमाण-पत्र मांगती हैं। मगर परिवहन विभाग और पुलिस महकमे में गाड़ी चलाने का लाइसेंस देने, गाड़ी की वैधता प्रमाणित करने और चालकों को चरित्र प्रमाण-पत्र जारी करने में किस कदर भ्रष्टाचार व्याप्त है, यह कुछ दिनों पहले खुद केंद्र सरकार का परिवहन मंत्रालय भी स्वीकार कर चुका है। ऐसे में अकेले उबर नहीं, दूसरी रेडियो टैक्सी सेवाओं में भी फर्जी कागजात दिखा कर चालक नहीं पंजीकृत होंगे, दावा करना मुश्किल है।

सवाल है कि अगर उबर कंपनी ने भारतीय परिवहन नियमों के मुताबिक लाइसेंस हासिल नहीं किया था तो वह इतने दिनों से दिल्ली में कैसे इंटरनेट और फोन के जरिए अपनी सेवाओं का संचालन कर रही थी। क्या परिवहन विभाग को उसकी गतिविधियों की भनक नहीं थी। इस कंपनी का प्रबंधन बाहरी देश का है, इसकी सेवाएं अकेले दिल्ली में नहीं, बंगलुरु, मुंबई, हैदराबाद, चेन्नई, जयपुर, अमदाबाद, चंडीगढ़, कोलकाता और पुणे में भी उपलब्ध हैं। वह बिना वैध लाइसेंस के अपनी सेवाएं संचालित कर रही थी तो क्या इसकी जवाबदेही परिवहन विभाग की नहीं है। उसने दिल्ली में उबर की सेवाओं पर रोक लगा कर एक तरह से खुद को ही कठघरे में खड़ा कर लिया है। सार्वजनिक वाहनों में महिलाओं के साथ छेड़छाड़, बदसलूकी आदि की शिकायतें आम हैं, उनमें सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता करने की मांग लंबे समय से चल रही है। जब परिवहन विभाग और दिल्ली पुलिस आमतौर पर व्यवस्थित और पारदर्शी मानी जाने वाली टैक्सी सेवाओं की कमजोरियों पर नजर नहीं रख पा रहे, तो बाकी मामलों में उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है।

 

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