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पोषाहार का प्रबंध

जनसत्ता 22 सितंबर, 2014: सरकारी स्कूलों में बच्चों को पोषाहार मुहैया कराने के कार्यक्रम की गिनती देश की प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं में होती है। बेशक इसकी कुछ उपलब्धियां बताई जा सकती हैं। मसलन, इसके चलते स्कूलों में कमजोर तबकों के बच्चों का दाखिला बढ़ाने में मदद मिली। यह भी दावा किया जाता है कि कुपोषण […]

Author September 23, 2014 9:11 AM

जनसत्ता 22 सितंबर, 2014: सरकारी स्कूलों में बच्चों को पोषाहार मुहैया कराने के कार्यक्रम की गिनती देश की प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं में होती है। बेशक इसकी कुछ उपलब्धियां बताई जा सकती हैं। मसलन, इसके चलते स्कूलों में कमजोर तबकों के बच्चों का दाखिला बढ़ाने में मदद मिली। यह भी दावा किया जाता है कि कुपोषण की व्यापकता कम करने में यह योजना किसी हद तक सहायक सिद्ध हुई है। लेकिन इसकी तमाम खामियां भी जब-तब उजागर होती रही हैं। इनमें कुछ वैसी ही हैं जो सार्वजनिक वितरण प्रणाली में भी मौजूद हैं। मसलन, वितरण में धांधली, आबंटित अनाज की चोरी, हिसाब-किताब में गड़बड़ी आदि। पर सबसे चिंताजनक पहलू पोषाहार तैयार करने से लेकर सेवन तक होने वाले हादसे हैं। पिछले साल जुलाई में बिहार के सारण जिले में विषाक्त मिड-डे मील खाने से तेईस बच्चों की मौत हो गई थी। इस घटना ने देश भर को स्तब्ध कर दिया। तब योजना के स्वरूप से लेकर कार्यान्वयन तक, तमाम मुद््दों पर बहस चली। पर इन सारी चर्चाओं की कोई तर्कसंगति परिणति नहीं हो सकी। सारण की घटना के पखवाड़े भर बाद झारखंड के जमुई जिले के एक स्कूल में मिड-डे मील खाने से पचपन बच्चे बीमार हो गए। उसी दिन बिहार के एक स्कूल में भी वैसी ही घटना हुई, जिसने पंचानबे बच्चों को अस्वस्थ कर दिया। ये घटनाएं ऐसे राज्यों में हुर्इं जिन्हें देश के सबसे पिछड़े राज्यों में शुमार किया जाता है। पर ऐसी त्रासदी दिल्ली में भी हो चुकी है।
ताजा वाकया भी अपेक्षया संपन्न माने जाने वाले राज्य कर्नाटक की राजधानी बंगलुरु का है। पिछले हफ्ते बंगलुरु के एक सरकारी स्कूल के करीब साढ़े तीन सौ बच्चों ने मिड-डे मील खाने के बाद तेज सिरदर्द, पेट-दर्द, उलटी आदि की शिकायत की। उन्हें अस्पताल में भरती कराना पड़ा। स्कूल की एक शिक्षिका का कहना है कि उन्होंने पोषाहार में एक छिपकली पड़ी देखी थी, और फिर उनके आगाह करने पर पोषाहार-वितरण रोक दिया गया। अगर उनकी नजर न पड़ी होती, तो बीमार पड़ जाने वाले बच्चों की तादाद और अधिक हो सकती थी। इस योजना के तहत दिए जाने वाले पोषाहार की पोषकता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। गुणवत्ता का प्रश्न निहायत अपर्याप्त आबंटन से भी जुड़ा है, भ्रष्टाचार और कुप्रबंध से भी। सर्वोच्च न्यायालय अल्प आबंटन पर कई बार केंद्र और राज्य सरकारों को फटकार लगा चुका है। पर उससे कोई फर्क नहीं पड़ा है, जो यह बताता है कि वंचित तबकों के प्रति हमारी सरकारें कितनी संवेदनशील हैं! लेकिन पोषाहार का स्तर जैसा भी हो, क्या इस योजना को निरापद तक नहीं बनाया जा सकता? मिड-डे मील योजना केंद्र और राज्यों की साझेदारी से चलती है। इसमें केंद्र की वित्तीय सहभागिता पचहत्तर फीसद है और राज्यों की पच्चीस फीसद। अमल पर निगरानी के लिए केंद्र और राज्य से लेकर जिले और प्रखंड स्तर तक समितियां हैं। फिर भी पोषाहार के रोगाहार बन जाने के इतनी घटनाएं हो चुकी हैं कि कुछ लोग इस योजना के औचित्य पर ही सवाल उठाने लगे हैं। उनकी दलीलों को मान लिया जाए तो फिर मनरेगा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली की जरूरत पर भी सवाल उठाए जा सकते हैं। मगर इस योजना की व्यापक समीक्षा जरूर होनी चाहिए, ताकि जाना जा सके कि संचालन और निगरानी को कैसे दुरुस्त किया जा सकता है।

 

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