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महाराष्ट्र की बिसात

जनसत्ता 12 नवंबर, 2014: विश्वास मत के लिए विधानसभा का विशेष सत्र बुला लिए जाने के बाद भी महाराष्ट्र में यह संशय बना हुआ है कि आखिरकार सरकार की तस्वीर क्या होगी, वह साझा सरकार होगी या बाहरी समर्थन के सहारे चलेगी, या अल्पमत सरकार होगी? सोमवार को विशेष सत्र शुरू हुआ तो शिवसेना के […]

Author November 12, 2014 1:33 PM
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जनसत्ता 12 नवंबर, 2014: विश्वास मत के लिए विधानसभा का विशेष सत्र बुला लिए जाने के बाद भी महाराष्ट्र में यह संशय बना हुआ है कि आखिरकार सरकार की तस्वीर क्या होगी, वह साझा सरकार होगी या बाहरी समर्थन के सहारे चलेगी, या अल्पमत सरकार होगी? सोमवार को विशेष सत्र शुरू हुआ तो शिवसेना के विधायक विपक्ष में बैठे। यही नहीं, पार्टी ने विधानसभा सचिव को पत्र लिख कर अपने विधायक दल के नेता एकनाथ शिंदे को विपक्ष के नेता का दर्जा दिए जाने की मांग भी पेश कर दी। पर साथ ही उद्धव ठाकरे ने भाजपा से सुलह के दरवाजे भी खुले रखे हैं। दूसरी ओर, भाजपा भी दोहरा खेल खेल रही है। एक तरफ भाजपा यह जता रही है कि उसे शिवसेना का हाथ थामने की कोई गरज नहीं है, पर उसके साथ सत्ता का गणित पक्का करने की कोशिश भी चल रही है। इस तरह सरकार के गठन की कवायद ने जैसी स्थिति पैदा की है उसे विद्रूप कहना गलत नहीं होगा। भाजपा ने कहा है कि वह कांग्रेस को छोड़ कर हर किसी का समर्थन लेने को तैयार है। जाहिर है, वह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से भी दोस्ती गांठ सकती है, जिसे चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने भ्रष्टाचारवादी कहा था।

महाराष्ट्र की पिछली सरकार में राकांपा भी शामिल थी। अगर जनादेश कांग्रेस के खिलाफ है, तो राकांपा के खिलाफ कैसे नहीं है? राकांपा ने भाजपा को न जाने कितनी बार सांप्रदायिक कहा होगा। पर चुनाव नतीजे आते ही भाजपा को बिना शर्त समर्थन देने का प्रस्ताव उसने कर दिया था। तब से वह यह पेशकश रह-रह कर दोहराती रही है। राज्य में एक अजीब सियासी खेल चल रहा है। शिवसेना और राकांपा, दोनों पार्टियां यह चाहती हैं कि फडणवीस सरकार केवल उन्हीं पर निर्भर रहे। जबकि भाजपा दोनों को यह जताना चाहती है कि वह किसी की मोहताज नहीं है। पर वह यह भी जानती है कि दोनों में से किसी एक के समर्थन के बिना उसकी सरकार नहीं चल सकती। निर्दलीयों और कुछ छोटी पार्टियों के समर्थन से भाजपा विधानसभा में अपनी ताकत भले बढ़ा ले, पर बहुमत का कुछ न कुछ फासला बना रहेगा। इसलिए न सिर्फ उद्धव ठाकरे ने मेलमिलाप की संभावना बनाए रखी है, भाजपा भी फिर से उनसे पटरी बिठाने में लगी हुई है। गतिरोध है तो मंत्रालयों के बंटवारे को लेकर। इस बीच भाजपा के अलावा शिवसेना और कांग्रेस ने भी विधानसभा अध्यक्ष पद के लिए अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं।

कांग्रेस की दिलचस्पी जहां भाजपा की परेशानी बढ़ाने में होगी, वहीं शिवसेना अपनी शर्तें मनवाने के लिए भाजपा पर दबाव बनाने का कोई दांव नहीं छोड़ना चाहती। पार्टी के सांसद अनिल देसाई को मोदी मंत्रिमंडल में शामिल होने से अंतिम घड़ी में रोक देने का उद्धव का फैसला इसी तरकीब का हिस्सा था। हर तरह के दांव-पेच चलते हुए सभी पार्टियां महाराष्ट्र के विकास की दुहाई दे रही हैं। पर साफ है कि यह सत्ता के लिए होने वाली उठापटक है। ऐसे में जो सरकार बनेगी, वह कितनी टिकाऊ होगी? अगर वह अपने स्थायित्व की समस्या किसी तरह हल भी कर ले, तो जन-आकांक्षाओं पर कहां तक खरी उतरेगी? एक समय उत्तर प्रदेश में भाजपा की कल्याण सिंह सरकार ने बहुमत का जुगाड़ करने की खातिर समर्थन देने वाले सभी निर्दलीयों को मंत्रिपद से पुरस्कृत किया था। कर्नाटक में भी भाजपा ने इसी तरह से काम चलाया था। पर आज उसे शिवसेना की मांगें अतिरंजित दिख रही हैं तो इसके पीछे उसकी महत्त्वाकांक्षा है। लोकसभा में अपने दम पर बहुमत हासिल करने के बाद भाजपा राज्यों में भी एकछत्र राज चाहती है। लेकिन महाराष्ट्र के समीकरण इसकी इजाजत नहीं देते।

 

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