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खुदकुशी की खेती

महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र किसानों की आत्महत्याओं के कारण कई बार सुर्खियों में आ चुका है। अलबत्ता ऐसी घटनाएं राज्य के मराठवाड़ा और दूसरे प्रदेशों खासकर कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब में भी होती रही हैं। पिछले दो दशक में देश भर में दो लाख से ज्यादा किसान खुदकुशी कर चुके हैं। इस दौरान अधिकतर […]

महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र किसानों की आत्महत्याओं के कारण कई बार सुर्खियों में आ चुका है। अलबत्ता ऐसी घटनाएं राज्य के मराठवाड़ा और दूसरे प्रदेशों खासकर कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब में भी होती रही हैं। पिछले दो दशक में देश भर में दो लाख से ज्यादा किसान खुदकुशी कर चुके हैं। इस दौरान अधिकतर वर्षों में भारत ने ऊंची विकास दर हासिल की और उसकी छवि तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था वाले देश की बनी। पर किसानों के हिस्से क्या आया? उनकी हालत वैसी ही शोचनीय बनी हुई है और उनके खुदकुशी करने का सिलसिला भी जारी है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस साल देश भर में अब तक कुल तीन सौ एक किसान आत्महत्या कर चुके हैं। पिछले बरसों में भी ऐसी सबसे ज्यादा घटनाएं महाराष्ट्र में हुई थीं; अब भी वही स्थिति है। इस साल महाराष्ट्र में अब तक ऐसे दो सौ चार मामले सामने आ चुके हैं। इसका कारण सूखे को बताया जा रहा है।

इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून के कमजोर रहने का खमियाजा राज्य को भुगतना पड़ा है। इसके मद््देनजर राज्य सरकार ने बीस हजार गांवों को सूखाग्रस्त घोषित किया है और राहत-कार्य के लिए केंद्र से साढ़े चार हजार रुपए के पैकेज की मांग की है। हालात का जायजा लेने के लिए केंद्र ने अपनी एक टीम महाराष्ट्र भेजी है। दूसरी ओर, सोमवार को विधानसभा में इस मसले पर विपक्ष ने फडणवीस सरकार को घेरने की कोशिश की। इस तरह महाराष्ट्र में किसानों की खुदकुशी एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई है। पर सवाल है कि क्या हमारे राजनीतिक दल खेती और किसानों की हालत को लेकर वाकई संजीदा हैं? महीना भर पहले तेलंगाना में किसानों की आत्महत्याओं को लेकर सियासी पारा चढ़ गया था। जब यह मुद््दा विधानसभा में उठा तो चंद्रशेखर राव सरकार का टका-सा जवाब था कि किसानों की आत्महत्या की घटनाएं पहले भी होती थीं। किसानों के लिए उसने राहत के कोई ठोस कदम उठाए हों या नहीं, राज्य के पहले ही बजट सत्र में विधायकों की तनख्वाह दुगुनी कर दी। तेलंगाना भी सूखे की मार झेल रहा है और महाराष्ट्र भी। बारिश में थोड़ी-बहुत कमी कोई नई बात नहीं है। पर इतिहास में शायद ही पहले कभी पंद्रह-बीस वर्षों के भीतर इतने बड़े पैमाने पर किसानों ने आत्महत्या की हो। दरअसल, इस त्रासदी की जड़ें कृषि संकट में छिपी हैं; अलबत्ता प्रतिकूल मौसम की मार से इस संकट की तीव्रता बढ़ जाती है।

सूखे या कीट-प्रकोप आदि के चलते जब फसल मारी जाती है तब तो किसान मुसीबत में होते ही हैं, जब पैदावार अच्छी हो तब भी उसका वाजिब दाम न मिलने से वे खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं। खेती के घाटे का धंधा बनते जाने से किसानों की कर्जग्रस्तता बढ़ती गई है। सूखे की स्थिति में वे न बैंकों से लिए गए कर्ज की किस्तें चुका पाते हैं न अगली फसल के लिए लागत का इंतजाम कर पाते हैं। फिर, कइयों पर शादी-ब्याह, इलाज या किसी और काम से लिए गए कर्ज का बोझ भी रहता है, जो अमूमन साहूकारों से काफी ऊंची ब्याज दर पर लिया गया होता है। जब भी किसानों को संकट से उबारने की बात होती है, तो सस्ती ब्याज दर पर कृषि-ऋण मुहैया कराने के अलावा सरकारों को और कुछ नहीं सूझता। लेकिन जहां खेती पुसाने लायक न रह गई हो, राहतकारी ब्याज दर का कर्ज भी कोई राहत नहीं दे पाता है। फिर, फसल बीमा की योजनाएं इतनी अव्यावहारिक हैं कि मरहम के बजाय जख्म ही साबित होती हैं। राजनीतिक दल किसानों के लिए आंसू बहाने में कभी पीछे नहीं रहते, पर कृषि संकट की तह में जाने की जहमत वे कभी नहीं उठाते।

 

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