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सहयोग का सफर

हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी-20 की शिखर बैठक के लिए ऑस्ट्रेलिया गए, पर उनकी यह यात्रा दोनों देशों के आपसी रिश्तों में भी अहम मुकाम साबित हुई। अट्ठाईस साल बाद भारत के किसी प्रधानमंत्री ने ऑस्ट्रेलिया का दौरा किया। मोदी से पहले राजीव गांधी वहां गए थे। यों दोनों देशों के रिश्ते, ऑस्ट्रेलिया में भारतीय […]

Author November 20, 2014 1:24 AM
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हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी-20 की शिखर बैठक के लिए ऑस्ट्रेलिया गए, पर उनकी यह यात्रा दोनों देशों के आपसी रिश्तों में भी अहम मुकाम साबित हुई। अट्ठाईस साल बाद भारत के किसी प्रधानमंत्री ने ऑस्ट्रेलिया का दौरा किया। मोदी से पहले राजीव गांधी वहां गए थे। यों दोनों देशों के रिश्ते, ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हमलों की छिटपुट घटनाओं को छोड़ दें, तो हमेशा तनाव-रहित रहे हैं, पर उनमें प्रगाढ़ता की कमी भी रही है। गर्मजोशी की शुरुआत कुछ साल पहले ही हुई। यूपीए सरकार के कार्यकाल में, 2009 में रणनीतिक संबंध की पहल हुई, 2012 में तत्कालीन ऑस्ट्रेलिया प्रधानमंत्री जूलिया गेलार्ड के भारत दौरे के समय आपसी व्यापार के नए लक्ष्य तय किए गए। ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम हासिल करने की कवायद भी यूपीए सरकार ने ही अमेरिका से परमाणु करार के बाद शुरू की थी। इसके लिए ऑस्ट्रेलिया ने अपनी रजामंदी के संकेत भी दे दिए थे। उस सिलसिले को आगे बढ़ाने में मोदी सफल हुए हैं। ऑस्ट्रेलिया ने यूरेनियम निर्यात के लिए सहमति दे दी है। इसकी अहमियत दो खास वजहों से है। एक तो इसलिए कि दुनिया का सबसे बड़ा यूरेनियम भंडार ऑस्ट्रेलिया के पास ही है। दूसरे, उसकी यह सख्त नीति रही है कि जिस देश ने एनपीटी यानी परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर न किए हों, उसे यूरेनियम की आपूर्ति न की जाए। इसके बावजूद उसका भारत को यूरेनियम-निर्यात के लिए राजी होना यहां उसकी बढ़ती दिलचस्पी को ही दर्शाता है।

दरअसल, भारत के लिए जहां ऑस्ट्रेलिया अपनी खनिज-समृद्धि भू-राजनीतिक स्थिति के कारण विशेष महत्त्व रखता है, वहीं ऑस्ट्रेलिया को भारत में अपने लिए बाजार और नए व्यापारिक अवसर नजर आते हैं। लेकिन परमाणु करार अब भी अंतिम रूप नहीं ले सका है। संभवत: ऑस्ट्रेलिया की पुरानी नीति के कारण इसमें अब भी कुछ अड़चनें हैं। फिर, करार के अंतिम रूप लेने तक यह भी हो सकता है कि यूरेनियम की कीमत बढ़ जाए। दूसरे ताजा समझौते कैदियों की अदला-बदली, समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, पर्यटन और कला-संस्कृति के क्षेत्र में आदान-प्रदान से संबंधित हैं। यूपीए सरकार के समय से ऑस्ट्रेलिया के साथ मुक्त व्यापार समझौते की जो बात चल रही थी, उसे मूर्त रूप देने का इरादा मोदी और टोनी एबॉट ने दोहराया है। दोनों देशों का आपसी सालाना व्यापार फिलहाल पंद्रह अरब डॉलर है, जो कि संभावनाओं के मुकाबले काफी कम है। इसे अगले साल के अंत तक चालीस अरब डॉलर पर ले जाने का लक्ष्य तय किया गया है। रणनीतिक संबंध की जो सहमति पांच साल पहले बनी थी उसकी कोई साफ रूपरेखा इन वर्षों के दौरान नहीं उभर सकी। पहली बार इसमें स्पष्टता आई है। पर इसे चीन या किसी और के खिलाफ मोर्चेबंदी के रूप में देखना ठीक नहीं होगा।

रणनीतिक संबंध ऑस्ट्रेलिया ने चीन से भी कायम किए हैं, और उसके साथ वह मुक्त व्यापार समझौता भी कर चुका है। बहरहाल, मोदी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा की अहमियत को इस अवसर पर हुए द्विपक्षीय समझौतों तक सीमित नहीं किया जा सकता। वे वहां की राजधानी में ही रुके नहीं रहे, तीन और शहरों में भी गए। ऑस्ट्रेलिया की संसद को भी संबोधित किया और भारतीय मूल के लोगों को भी। वहां रह रहे भारतवंशियों ने भी उनके प्रति भरपूर उत्साह दिखाया और ऑस्ट्रेलिया के सांसदों ने भी। वहां की संसद को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया भारत की विदेश नीति में परिधि पर नहीं है, बल्कि भारत के लिए केंद्रीय महत्त्व रखता है। जिस तरह ऑस्ट्रेलिया के सभी सांसदों ने मोदी को न सिर्फ काफी चाव से सुना बल्कि उनकी खुलकर प्रशंसा की, उससे यह उम्मीद बनती है कि आने वाले वर्षों में कोई भी सरकार हो, भारत के साथ द्विपक्षीय रिश्ते और प्रगाढ़ होंगे।

 

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