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सजा के बजाय

विधि आयोग की सिफारिश के मद्देनजर सरकार का खुदकुशी की कोशिश को दंडनीय अपराध के श्रेणी से बाहर करने का फैसला स्वागतयोग्य है। भारतीय दंड संहिता से इस धारा को समाप्त करने की सिफारिश लंबे समय से की जाती रही है। चौवालीस साल पहले भी विधि आयोग ने इस कानून को हटाने का प्रस्ताव किया […]

विधि आयोग की सिफारिश के मद्देनजर सरकार का खुदकुशी की कोशिश को दंडनीय अपराध के श्रेणी से बाहर करने का फैसला स्वागतयोग्य है। भारतीय दंड संहिता से इस धारा को समाप्त करने की सिफारिश लंबे समय से की जाती रही है। चौवालीस साल पहले भी विधि आयोग ने इस कानून को हटाने का प्रस्ताव किया था। राज्यसभा ने इस पर अपनी सहमति भी दे दी थी, मगर लोकसभा भंग हो जाने के कारण इसे अंतिम रूप नहीं दिया जा सका। अभी तक आत्महत्या का प्रयास करने वाले के खिलाफ जुर्माना और एक साल कैद की सजा का प्रावधान है। तमाम न्यायविद मानते रहे हैं कि खुदकुशी करने में नाकाम रहने वाले व्यक्ति के लिए यह दोहरी प्रताड़ना जैसा है।

ऐसा करने में जो सफल हो गया, यानी जिसने स्वेच्छा से मौत को गले लगा लिया, कानून उसके खिलाफ तो कुछ नहीं कर सकता, पर जो बच गया उसे प्रताड़ित करता है। अनेक मानसिक यंत्रणाओं से गुजरने के बाद ही कोई व्यक्ति आत्महत्या का रास्ता अख्तियार करता है। इसलिए उसे मानसिक रोगी की श्रेणी में रखा जाना चाहिए, न कि अपराधी की। ऐसे व्यक्ति को सहानुभूति और चिकित्सीय मदद की दरकार होती है, सजा की नहीं। सजा पाने के बाद उसके सही रास्ते पर लौटने की संभावना क्षीण ही बनी रहती है। पुलिस और अस्पताल में ऐसे व्यक्तियों को नाहक बहुत सारे सवालों से गुजरना पड़ता है। ऐसे में खुदकुशी की कोशिश कर बच जाने वाले लोगों के लिए तय भारतीय दंड संहिता की धारा 309 को हटाए जाने का फैसला मानवीय तकाजे के अनुरूप है।

खुदकुशी की प्रवृत्ति को लेकर दुनिया में अनेक अध्ययन हो चुके हैं। यह अचानक पैदा हुई मानसिक स्थिति नहीं, बल्कि अनेक परेशानियों, हताशा, मानसिक और भावात्मक आघात से लगातार गुजरते रहने के बाद उभरती है। ऐसे लोगों को इलाज और सकारात्मक वातावरण में रख कर जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण बदला जा सकता है। सजा का प्रावधान होने से ऐसे लोगों के सामान्य जीवन की तरफ लौटने या उनमें जीवन के प्रति सकारात्मक नजरिया विकसित होने की उम्मीद कम हो जाती है। इसलिए भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, सिंगापुर जैसे कुछेक देशों को छोड़ कर दुनिया में कहीं भी आत्महत्या में विफल रहे लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का प्रावधान नहीं है।

वैसे लोगों को जरूर दोषी माना जा सकता है, जो किसी को आत्महत्या के लिए उकसाते या ऐसा वातावरण पैदा करते हैं जिससे उसमें आत्मघाती प्रवृत्ति उभरती है। खुदकुशी की प्रवृत्ति को कानूनी कड़ाई के बजाय उन स्थितियों पर काबू पाने के प्रयास से कम किया या रोका जा सकता है, जिनके चलते व्यक्ति इस दिशा में कदम बढ़ाता है। पिछले कुछ सालों में सबसे अधिक आत्महत्याएं किसानों ने की। दहेज के कारण बहुत सारी लड़कियां खुदकुशी कर लेती हैं। परीक्षा में विफल होने पर विद्यार्थियों में और कारोबार में घाटा होने, कर्ज का बोझ बढ़ते जाने आदि के कारण भी लोगों में यह प्रवृत्ति उभरती देखी गई है। धारा 309 को समाप्त करने के साथ-साथ सरकार को इन स्थितियों से पार पाने की दिशा में भी गंभीरता से प्रयास करने की जरूरत है। परीक्षा में विफल होने पर विद्यार्थियों में आत्महत्या की प्रवृत्ति में कमी दर्ज हुई है, तो इसलिए कि उन्हें व्यापक स्तर पर सकारात्मक सोच पैदा करने वाली सेवाएं मुहैया कराई जाने लगी हैं। खेती-किसानी और दूसरे क्षेत्रों में भी इसी तरह की सहायता सेवाएं शुरू हों तो अपेक्षित नतीजों की उम्मीद की जा सकती है।

 

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