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शाही समाजवाद

समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने अपना पचहत्तरवां जन्मदिन जिस शाही अंदाज में मनाया उससे सहज ही यह सवाल उठता है कि क्या सचमुच वे समाजवाद में आस्था रखते हैं और गरीबों के प्रति उनके मन में हमदर्दी है? उत्तर प्रदेश के रामपुर में उनके पचहत्तरवें जन्मदिन पर उनकी शाही सवारी निकली, लंदन […]

Author November 24, 2014 9:44 AM
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समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने अपना पचहत्तरवां जन्मदिन जिस शाही अंदाज में मनाया उससे सहज ही यह सवाल उठता है कि क्या सचमुच वे समाजवाद में आस्था रखते हैं और गरीबों के प्रति उनके मन में हमदर्दी है? उत्तर प्रदेश के रामपुर में उनके पचहत्तरवें जन्मदिन पर उनकी शाही सवारी निकली, लंदन से मंगाई गई विशेष बग्घी में सवार होकर वे जनता का अभिवादन करने या लेने के लिए निकले। छोटे-से शहर में सौ भव्य स्वागत द्वार बनाए गए। मुलायम सिंह का कारवां राजसी शानो-शौकत लिए हुए तो था ही, उसे उन्होंने औपनिवेशिक जमाने की रंगत भी दी। उन्हें भले लगता हो कि आज वे किसी बहुत ऊंचे मुकाम पर हैं, पर इस प्रसंग से उनकी विश्वसनीयता रसातल में चली गई है। यों यह पहला मौका नहीं है जब मुलायम सिंह ने सामंती आडंबर का प्रदर्शन किया हो।

सैफई में हर साल वे इसे करते आए हैं। सैफई का जश्न आयोजित करने में उन्हें और अखिलेश यादव को तब भी कोई संकोच नहीं हुआ जब मुजफ्फरनगर दंगों के पीड़ित परिवार राहत-शिविरों में ठिठुर रहे थे और कई बच्चों की मौत की भी खबर आई थी। एक समय मुलायम सिंह के शाही तामझाम की कमान अमर सिंह संभालते थे। उनके पचहत्तरवें जन्मदिन का नवाबी आयोजन प्रदेश के शहरी विकास मंत्री आजम खान ने किया। आजम खान की मुलायम सिंह और अखिलेश सिंह से नाराजगी जब-तब सामने आती रही है। लेकिन पिछले हफ्ते सपा सुप्रीमो के प्रति आजम खान की भक्ति हिलोर मार रही थी। वे राज्य के एक विश्वविद्यालय के कुलाधिपति बना दिए गए हैं और उनकी पत्नी राज्यसभा में पहुंच गई हैं। क्या इसी का अहसान चुकाने के लिए उन्होंने अपने गृहनगर में यह तामझाम खड़ा किया? जो हो, मुलायम सिंह ने उसे स्वीकार क्यों किया? लोहिया को अपना आदर्श मानने वाले नेताजी को यह सब अखरा क्यों नहीं? उन्हें अपना जन्मदिन सादगी से मनाने की बात क्यों नहीं सूझी?

जब इस सारी फिजूलखर्ची पर सवाल उठा तो आजम खान ने जो जवाब दिया उससे उनकी हेठी ही जाहिर होती है। क्या सीधा जवाब देना वे इसलिए नहीं चाहते थे कि यह सरकारी खजाने के दुरुपयोग का मामला भी हो सकता है? यह सवाल आजम खान से ज्यादा मुलायम सिंह और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का पीछा करता रहेगा। अखिलेश यादव ने पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान सपा की पिछली गलतियां न दोहराने और राज्य की तस्वीर बदलने का वादा किया था। लोगों ने उनकी बातों पर भरोसा भी किया। पर अखिलेश भूल गए हैं कि राज्य के आम लोग कैसी असुविधाएं झेल रहे हैं। बिजली की किल्लत तो हर जगह है ही, राज्य इस वक्त सूखे की मार भी झेल रहा है। इसकी फिक्र न तो राज्य सरकार को है न सत्तारूढ़ पार्टी को। अलबत्ता नेताजी के जन्मदिन पर खैरात बांटने का कार्यक्रम पार्टी को जरूर सूझा। बदायूं में ऐसे ही एक कार्यक्रम में मची भगदड़ में एक महिला की मौत हो गई। अपने जन्मदिन पर खर्च का भोंडा प्रदर्शन करने वाले मुलायम सिंह अकेले नेता नहीं हैं। मायावती भी अपना जन्मदिन किस शाही अंदाज में मनाती थीं यह लोग भूले नहीं हैं। उनकी पार्टी के विधायक और कार्यकर्ता उनके लिए महंगे उपहारों का इंतजाम करते थे और इसके लिए अवैध वसूली के आरोप भी लगते रहे। आखिर चौतरफा आलोचनाओं से सबक लेकर इस बार मायावती ने अपना जन्मदिन सादगी से मनाया। मुलायम सिंह कब सबक लेंगे! जहां पार्टी के सर्वोच्च नेता का यह हाल हो, वहां पार्टी के दूसरे लोग क्या सीखेंगे?

 

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