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मानवाधिकार का पाठ

जनसत्ता 25 सितंबर, 2014: जनतंत्र का मतलब केवल चुनाव नहीं होता, यह भी होता है कि मानवाधिकारों का खयाल रखा जाए। इस कसौटी पर भारतीय लोकतंत्र की कमजोरियां रह-रह कर उजागर होती रही हैं। मानवाधिकारों के हनन की अनगिनत शक्लें हैं, पर इसका चरम रूप हिरासत में उत्पीड़न और फर्जी मुठभेड़ के मामलों में दिखाई […]

Author Updated: September 25, 2014 11:06 AM

जनसत्ता 25 सितंबर, 2014: जनतंत्र का मतलब केवल चुनाव नहीं होता, यह भी होता है कि मानवाधिकारों का खयाल रखा जाए। इस कसौटी पर भारतीय लोकतंत्र की कमजोरियां रह-रह कर उजागर होती रही हैं। मानवाधिकारों के हनन की अनगिनत शक्लें हैं, पर इसका चरम रूप हिरासत में उत्पीड़न और फर्जी मुठभेड़ के मामलों में दिखाई देता है। राजनीतिक दल ऐसी घटनाओं पर अमूमन चुप्पी साधे रहते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने अलबत्ता फर्जी मुठभेड़ की शिकायतों को गंभीरता से लिया है और कई बार केंद्र और राज्य सरकारों को फटकार भी लगाई है। वह पहले ही अपने एक फैसले में इस तरह की घटना को वर्दी में की गई हत्या करार दे चुका है। पर यह पहला मौका है जब सर्वोच्च अदालत ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए मुठभेड़ की बाबत पुलिस के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं और कड़ाई से उनका पालन करने को कहा है। यों उसने इस हकीकत को स्वीकार किया है कि पुलिस को आतंकवादियों, जघन्य अपराधियों और संगठित अपराध के गिरोहों से मुकाबला करना पड़ता है। इसमें पुलिस को अपने लिए खतरा उठा कर कार्रवाई करनी पड़ती है।

यह पुलिस के कर्तव्य का हिस्सा है। पर इसके बरक्स फर्जी मुठभेड़ की घटनाएं भी होती रही हैं। पुरस्कार या पदोन्नति का लोभ इसका एक खास कारण रहा है। इसलिए अदालत ने निर्देश दिया है कि मुठभेड़ वास्तविक थी, यह साबित होने के बाद ही बिना बारी के पदोन्नति का लाभ दिया जाए। साथ ही उसने मुठभेड़ में मौत होने पर जांच अनिवार्य कर दी है। अगर कोई फर्जी मुठभेड़ का मामला हो, तो मारे गए व्यक्ति के परिजन मुकदमा दायर कर सकते हैं। इन निर्देशों का प्रभाव यह होगा कि पुलिस अपराधी को पकड़ कर कानूनी प्रक्रिया के हवाले करने को पहले से कहीं अधिक प्राथमिकता देगी, वह गोली तभी चलाएगी जब अपने बचाव या विवशता में ऐसा करना जरूरी हो। अपने फैसले के जरिए सर्वोच्च अदालत ने संविधान के अनुच्छेद इक्कीस की याद भी दिलाई है, जिसमें हर नागरिक को गरिमा के साथ जीने का अधिकार दिया गया है। पर इसके विरोधाभास भी हमारे कई कानूनों में मौजूद हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण अफस्पा यानी सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून है, जिसके तहत सुरक्षा बलों को दंडमुक्ति के आश्वासन के साथ किसी भी हद तक जाने की छूट हासिल है; उनके खिलाफ केंद्र की इजाजत के बगैर कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती। अफस्पा-प्रदत्त यह निरंकुशता ही कश्मीर और पूर्वोत्तर में फर्जी मुठभेड़ की घटनाओं की जड़ रही है। जब भी इस कानून के खिलाफ आवाज उठती है, उसे सेना की देशभक्ति पर अंगुली उठाने का प्रयास बता कर अनसुना कर दिया जाता है। पर यह सोचना चाहिए कि कुछ सुरक्षाकर्मियों के दुष्कृत्य के चलते सेना की साख पर आंच क्यों आने दी जाए?

मणिपुर के गुमशुदा लोगों के परिजनों के संगठन ने राज्य के करीब डेढ़ हजार लोगों के फर्जी मुठभेड़ में मारे जाने की शिकायत के साथ सर्वोच्च न्यायालय में जांच कराने की अर्जी दी थी। हालांकि अदालत ने सिर्फ छह चुनिंदा मामलों की जांच के लिए न्यायमूर्ति संतोष हेगड़े की अध्यक्षता में समिति गठित की, पर समिति ने सभी छह मुठभेड़ों को झूठा पाया। इनमें मारे जाने वालों में एक बच्चा भी था। ऐसे मामलों में न्याय दिलाने में हमारी राज्य-व्यवस्था की कोई दिलचस्पी नहीं दिखती, बल्कि वह संवेदनहीन नजर आती है। सच्चाई पर परदा डालना भी उसकी आदत हो गई है, जिसका ताजा उदाहरण यह है कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक पिछले साल फर्जी मुठभेड़ की सिर्फ दो घटनाएं हुर्इं, दोनों असम में। इस पर अदालत ने भी हैरत जताई है। बहरहाल, विचाराधीन कैदियों की रिहाई के आदेश के बाद हाल में मानवाधिकारों के पक्ष में अदालत का यह दूसरा अहम फैसला है, और इसका भी दूरगामी असर होगा।

 

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