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ताक पर मर्यादा

अभी केंद्रीय राज्यमंत्री निरंजन ज्योति के आपत्तिजनक बयान पर उठा विवाद थमा भी नहीं था कि भाजपा के एक और सांसद ने संसदीय गरिमा तार-तार कर दी। उत्तर प्रदेश के उन्नाव से भाजपा के टिकट पर चुने गए साक्षी महाराज ने महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को देशभक्त करार दिया। उनका यह कहना शर्मनाक […]

अभी केंद्रीय राज्यमंत्री निरंजन ज्योति के आपत्तिजनक बयान पर उठा विवाद थमा भी नहीं था कि भाजपा के एक और सांसद ने संसदीय गरिमा तार-तार कर दी। उत्तर प्रदेश के उन्नाव से भाजपा के टिकट पर चुने गए साक्षी महाराज ने महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को देशभक्त करार दिया। उनका यह कहना शर्मनाक तो है ही, यह सवाल भी उठाता है कि क्या उन्होंने देशभक्ति की ऐसी ही समझ विकसित की है? भाजपा के इस सांसद ने जो कहा वह न केवल राष्ट्रपिता गांधी बल्कि तमाम देशभक्तों का अपमान है। पार्टी की किरकिरी होने के बाद साक्षी महाराज ने अपने बयान से पल्ला झाड़ लिया है, यह कह कर कि उन्होंने गलती से वह कह दिया था।

पर क्या बात इतने से खत्म हो जाती है? साध्वी निरंजन ज्योति के बयान पर फजीहत होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पार्टी के सांसदों को सख्त ताकीद की थी कि वे संभल कर बोलें, अगर बोलना जरूरी लगे तो लोगों को सरकार के कामकाज के बारे में बताएं। लेकिन एक हफ्ता भी नहीं बीता कि उनके एक सांसद ने उनकी नसीहत को पलीता लगा दिया। इस पर मोदी ने क्या कार्रवाई की? विपक्ष से संसद की कार्यवाही चलने की अपील करते हुए उन्होंने कहा था कि चूंकि साध्वी निरंजन ज्योति ने माफी मांग ली है, इसलिए मामला रफा-दफा किया जाए। पर संसदीय मर्यादा को ताक पर रखने और फिर खेद जता देने का खेल कब तक चलेगा? भाजपा के सत्ता में आने के बाद नाथूराम गोडसे को महिमामंडित करने का यह अकेला मामला नहीं है। महाराष्ट्र में कुछ लोगों ने नाथूराम शौर्य दिवस मनाया। खबर है कि इसमें दो पूर्व विधायक भी शामिल थे। अच्छे दिन ऐसे ही संगठनों के आए हैं!

एक तरफ प्रधानमंत्री अपने भाषणों में महात्मा गांधी का उल्लेख देश को नैतिक प्रेरणा देने वाले महापुरुष के रूप में करते हैं, गांधी जयंती पर स्वच्छता अभियान शुरू करते हैं, अपनी आस्ट्रेलिया-यात्रा के दौरान गांधी प्रतिमा का अनावरण करते हैं और वहां उनसे खुद को हमेशा प्रेरणा-मिलने की बात कहते हैं। और दूसरी तरफ उनकी पार्टी के एक सांसद को देशभक्ति का उदाहरण पेश करने के लिए गांधी के हत्यारे का नाम सूझता है! साक्षी महाराज पहले भी लज्जाजनक विवादों का विषय रह चुके हैं। फिर भी पार्टी को उन्हें टिकट देने में कोई संकोच नहीं हुआ। लेकिन क्या कारण है कि मोदी की हिदायत का उनकी पार्टी पर कोई असर नहीं दिख रहा है? क्या यह एक तरह का ‘कार्य-विभाजन’ है कि दुनिया को सुनाने के लिए मोदी भली-भली नसीहतें देते रहें, और उनकी पार्टी के लोग सारी मर्यादाएं तोड़ते रहें?

प्रधानमंत्री ने पंद्रह अगस्त को लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए कहा था कि तेजी से विकास करना है तो लोग कम से कम दस साल के लिए जाति, धर्म के झगड़े भुला दें। पर खुद भाजपा समेत संघ परिवार के लोग ऐसे झगड़ों को हवा देने में लगे हैं। साध्वी निरंजन ज्योति की बाबत उनकी जाति बता कर जाति का कार्ड खेला जा रहा है! लोगों ने मोदी और भाजपा को भ्रष्टाचार के खिलाफ और विकास के लिए मौका दिया है। लेकिन चुन-चुन कर ऐसे विवाद खड़े किए जा रहे हैं जो विकास को बाधित करने और समाज में वैमनस्य फैलाने का ही काम करेंगे। क्या भाजपा ने जनादेश के मर्म को इतनी जल्दी भुला दिया है?

 

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