ताज़ा खबर
 

सत्ता समीकरण

त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में बाहरी समर्थन से सरकार के गठन या साझा सरकार के अलावा और कोई चारा नहीं होता। लेकिन भाजपा और शिवसेना का मेल-मिलाप स्थिति की इस अनिवार्यता से ज्यादा सत्ता की खुली सौदेबाजी का उदाहरण है। मंत्रिमंडल में मनमाफिक जगह देने की मांग न माने जाने पर शिवसेना ने विपक्ष में […]
Author December 8, 2014 11:57 am
IT Act Section 66A, IT Act, Section 66A, Supreme Court

त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में बाहरी समर्थन से सरकार के गठन या साझा सरकार के अलावा और कोई चारा नहीं होता। लेकिन भाजपा और शिवसेना का मेल-मिलाप स्थिति की इस अनिवार्यता से ज्यादा सत्ता की खुली सौदेबाजी का उदाहरण है। मंत्रिमंडल में मनमाफिक जगह देने की मांग न माने जाने पर शिवसेना ने विपक्ष में बैठने का फैसला किया था। लेकिन सवा महीना भी नहीं बीता कि उसने विपक्ष क ी कुर्सी खाली कर दी। और जिस सरकार के विश्वास-मत के विरोध में उसने वोट दिया था, जिसके ध्वनि-मत से पारित विश्वास-मत को असंवैधानिक ठहराया था, उसी सरकार में वह शामिल हो गई। इसलिए कि मंत्रिपदों को लेकर भाजपा से उसका समझौता हो गया। मुख्यमंत्री के विश्वास मत पेश करने से पहले भी दोनों पार्टियां साझेदारी का मसला सुलझा सकती थीं। पर न शिवसेना अपनी मांग से पीछे हटने को राजी थी न भाजपा झुकने को। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के बिना शर्त समर्थन देने की पेशकश के सहारे भाजपा ने शिवसना को अपनी नई हैसियत का अहसास कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह उन दो पार्टियों का बदला हुआ रिश्ता था, जो ढाई दशक तक एक साथ रह चुकी थीं। इस दरम्यान दोनों के बीच एक दूसरे को कोसने और भला-बुरा कहने का भी सिलसिला चलता रहा और सत्ता में साझेदारी का हिसाब भी बिठाया जाता रहा। आखिरकार हिसाब बैठ गया और बीते हफ्ते फडणवीस मंत्रिमंडल के विस्तार में जिन बीस विधायकों ने मंत्री-पद की शपथ ली उनमें आधे भाजपा के थे और आधे शिवसेना के। देवेंद्र फडणवीस ने नौ मंत्रियों के साथ इकतीस अक्तूबर को शपथ ली थी।इस तरह मुख्यमंत्री समेत राज्य-मंत्रिमंडल की सदस्य-संख्या तीस तक पहुंच गई है। शायद मंत्रिमंडल के अगले विस्तार में शिवसना के दो और विधायकों को मौका मिलेगा।

पिछले हफ्ते दोनों दलों के मिला कर बीस मंत्री बने और इसमें जातिगत समीकरणों का खूब खयाल रखा गया, पर इस विस्तार में कोई महिला शामिल नहीं की गई। शिवसेना ने उपमुख्यमंत्री पद और गृह मंत्रालय देने की मांग के साथ भाजपा पर दबाव बनाने का खेल शुरू किया था, पर उसकी ये दोनों मुराद पूरी नहीं हुई। फिर भी वह गठजोड़ के लिए तैयार हो गई। क्योंकि वह जानती थी कि परिस्थितियां बदल चुकी हैं; केंद्र में भाजपा उसके समर्थन पर निर्भर नहीं है, राज्य में जरूर भाजपा को समर्थन की जरूरत है, पर वह राकांपा की मदद से अपना काम चला सकती है। फिर, पंद्रह साल लगातार सत्ता से बाहर रही शिवसेना को यह डर भी रहा होगा कि सरकार में शामिल न होने पर उसके विधायक दल में सेंध लग सकती है, केंद्र सरकार में हिस्सेदारी से भी उसे वंचित होना पड़ सकता है। भाजपा के हाथ खींच लेने पर उसे बृहन्मुंबई नगर निगम पर अपना नियंत्रण भी गंवाना पड़ेगा। भाजपा ने शिवसेना को भले उसकी अपेक्षा से कम हिस्सेदारी दी हो, पर इतने के लिए भी वह तैयार नहीं थी। आखिरकार भाजपा ने नरमी दिखाई तो इसलिए कि राकांपा के समर्थन को वह पूरी तरह भरोसेमंद मान कर नहीं चल सकती थी। लेकिन मेल-मिलाप के बावजूद दोनों पार्टियों का गठबंधन पहले जैसा तनाव-रहित शायद ही रह पाए। विधानसभा चुनाव से पहले गठजोड़ टूटने से लेकर हाल तक उनके बीच जो खटास का दौर चला है उसे दोनों पार्टियां बिल्कुल भुला दें, तो भी उनके रिश्ते का गणित अब बदल चुका है।

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.