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सुविधा का कराधान

वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम में संशोधन को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी से स्वाभाविक ही राहत की उम्मीद जगी है। करीब सात साल पहले यूपीए सरकार ने इस कानून का प्रारूप तैयार किया था, मगर राज्य सरकारों का सहयोग न मिल पाने की वजह से इसे अंतिम रूप नहीं दिया जा सका। राज्य सरकारों को […]

Author December 20, 2014 4:00 AM
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वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम में संशोधन को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी से स्वाभाविक ही राहत की उम्मीद जगी है। करीब सात साल पहले यूपीए सरकार ने इस कानून का प्रारूप तैयार किया था, मगर राज्य सरकारों का सहयोग न मिल पाने की वजह से इसे अंतिम रूप नहीं दिया जा सका। राज्य सरकारों को लगता रहा कि करों में समरूपता आ जाने से उन्हें राजस्व में घाटा उठाना पड़ेगा। अब इस पर राज्य सरकारों की सहमति मिल गई है। अभी तक वस्तुओं के उत्पादन और बिक्री पर दो तरह के कर लगते हैं। केंद्र सरकार सेवाओं पर कर वसूलती है, तो राज्य सरकारें उनके वितरण और बिक्री से जुड़ी गतिविधियों पर। प्रस्तावित कानून के तहत अब सभी जगह एक ही प्रकार का कर वसूला जा सकेगा। इसके तहत उत्पाद शुल्क, बिक्री कर, सेवा कर, प्रवेश शुल्क, राजस्व कर आदि को एक में मिला दिया जाएगा।

राज्य सरकारों को सबसे अधिक आपत्ति इस कानून को पेट्रोलियम पदार्थों पर लागू करने को लेकर थी। मगर इसके दायरे में उन्हें भी ले लिया गया है। साथ ही जमीन-जायदाद से जुड़े कारोबार पर भी यह कानून लागू होगा। आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि इस कानून के लागू होने के बाद देश की अर्थव्यवस्था में करीब ढाई फीसद की बढ़ोतरी होगी। लोगों की क्रयशक्ति बढ़ेगी और जमीन जायदाद के कारोबार में काली कमाई के प्रवेश पर अंकुश लगाना आसान होगा। फिलहाल राज्य सरकारों को राजस्व के रूप में होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए उन्हें अधिकार दिया गया है कि अगले तीन सालों तक वे बिक्री कर में एक से तीन फीसद तक अपनी ओर से बढ़ोतरी कर सकते हैं। इसके अलावा उनके राजस्व की भरपाई केंद्र भी करेगा।

अभी तक राज्यों में करों का ढांचा अलग-अलग होने की वजह से लोगों को एक ही वस्तु की कीमत अलग-अलग चुकानी पड़ती है। मसलन, पेट्रोलियम पदार्थों पर। इसका असर वस्तुओं के उत्पादन पर पड़ता है। औद्योगिक इकाइयों को माल की खरीद, ढुलाई, उत्पादन आदि के लिए विभिन्न राज्यों से मदद लेनी पड़ती है, ऐसे में कर प्रणाली एक न होने के कारण उन्हें अधिक खर्च वहन करना पड़ता है। जाहिर है, इससे वस्तुओं की कीमत बढ़ती है, जिसका बोझ आखिरकार उपभोक्ता पर पड़ता है।

राज्य सरकारें अगर इस कर प्रणाली पर सहमत नहीं हो पा रही थीं तो उसके पीछे कुछ राजनीतिक वजहें भी थीं। अब भाजपा सरकार उन्हें समझाने में सफल रही है कि फिलहाल भले कुछ समय तक नुकसान उठाना पड़े, लेकिन आगे चल कर लाभ मिलेगा। जमीन-जायदाद के मामले में पिछले कुछ सालों से कीमतों में अतार्किक बढ़ोतरी हुई है तो इसके पीछे एक कारण करों में समरूपता न होना भी रहा है। पूरे देश में कर ढांचा एक जैसा होने से न सिर्फ भवन निर्माण आदि पर आने वाली लागत कम होगी, उपभोक्ता को सस्ती दर पर मकान आदि मिल सकेंगे, बल्कि इस क्षेत्र में काली कमाई छिपाने वालों पर भी नजर रखना सुगम हो जाएगा।

मगर इस बात की जरूरत फिर भी बनी रहेगी कि औद्योगिक इकाइयां, भवन निर्माता कंपनियां आदि लागत के अनुरूप विक्रय मूल्य के निर्धारण में कितनी पारदर्शिता बरतती हैं। इस मामले में दवा कंपनियों की मनमानी बहुत पहले से उजागर है। केंद्र और राज्य सरकारों के तमाम प्रयासों के बावजूद उनकी कीमतों को तर्कसंगत नहीं बनाया जा सका है। इसी तरह जमान-जायदाद के कारोबार में कीमतों के निर्धारण, खरीद-बिक्री को लेकर कोई व्यावहारिक तंत्र विकसित नहीं किया जा सका है। देश में समरूप कर ढांचा लागू करने के साथ-साथ इन मनमानियों पर रोक लगाने की कारगर व्यवस्था भी होनी चाहिए।

 

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