ताज़ा खबर
 

सुविधा के वाहन

करीब सात महीने पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने बिना पंजीकरण के राजधानी में अवैध तरीके से चल रहे इ-रिक्शा मालिकों के खिलाफ कार्रवाई न करने पर सरकारी महकमों को फटकार लगाई थी और इनके संचालन के लिए व्यावहारिक नीति बनाने का आदेश दिया था। उसके बाद दिल्ली में इ-रिक्शा पर पाबंदी लगी थी। लेकिन गुरुवार […]

Author December 20, 2014 1:28 PM

करीब सात महीने पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने बिना पंजीकरण के राजधानी में अवैध तरीके से चल रहे इ-रिक्शा मालिकों के खिलाफ कार्रवाई न करने पर सरकारी महकमों को फटकार लगाई थी और इनके संचालन के लिए व्यावहारिक नीति बनाने का आदेश दिया था। उसके बाद दिल्ली में इ-रिक्शा पर पाबंदी लगी थी। लेकिन गुरुवार को लोकसभा में इससे संबंधित एक अहम विधेयक को मंजूरी मिलने के साथ ही दिल्ली में बैटरी-चालित इ-रिक्शों के चलने का रास्ता साफ हो गया है। मोटर वाहन संशोधन विधेयक 2014 के तहत पहली सुविधा यह तय की गई है कि इ-रिक्शा चलाने वालों को ड्राइविंग लाइसेंस पाने के लिए आठवीं पास होने की पात्रता से मुक्त कर दिया गया है। इसके अलावा, अभी तक व्यावसायिक ड्राइविंग लाइसेंस पाने की प्रक्रिया काफी लंबी थी और इसमें कई बार डेढ़ साल तक का वक्त लग जाता था। इ-रिक्शा से गुजारा करने वालों के लिए इतने वक्त की कितनी कीमत होगी, यह समझा जा सकता है। शायद इसीलिए नए कानून में व्यवस्था है कि इ-रिक्शा चलाने के इच्छुक व्यक्ति निर्माता कंपनी या फिर संबंधित संस्था की ओर से दस दिन का प्रशिक्षण लेकर व्यावसायिक ड्राइविंग लाइसेंस हासिल कर सकेंगे। दरअसल, सार्वजनिक परिवहन के रूप में इ-रिक्शा पर बढ़ती निर्भरता और इससे बड़ी तादाद में लोगों को रोजगार मिलने के चलते इनके नियमन की सख्त जरूरत थी। इसी के मद्देनजर दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर इ-रिक्शों का पंजीकरण अनिवार्य करने और एक व्यावहारिक नीति बनाने की मांग की गई थी। अब नए नियमों को लोकसभा की मंजूरी के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि इ-रिक्शे सड़कों पर जोखिम नहीं, सुविधा के पर्याय बनेंगे।

दिल्ली में बैटरी-चालित रिक्शों की शुरुआत के पीछे पर्यावरण को स्वच्छ बनाने और थोड़ी दूरी तक आवाजाही के लिए एक सुविधाजनक सवारी उपलब्ध कराने की मंशा थी। काफी हद तक ऐसा हुआ भी। लेकिन पिछले दो सालों के भीतर दिल्ली की सड़कों पर इ-रिक्शों की बढ़ती तादाद के चलते हालत यह हो गई कि न सिर्फ सामान्य यातायात इनके चलते प्रभावित होने लगा, बल्कि सामान्य मुसाफिरों के लिए भी कई तरह की परेशानियां होने लगी। खासकर व्यस्त सड़कों पर इन रिक्शों में जिस तरह बनावट, यात्रियों की तय संख्या और निर्धारित गति के मामले में नियमों को धता बताया जाने लगा, उससे जोखिम बढ़ता गया था। इसके चलते कई गंभीर हादसे भी सामने आए। लेकिन चूंकि इन वाहनों का कोई पंजीकरण नहीं था और ये यातायात से संबंधित कानूनों के दायरे में नहीं थे, इसलिए किसी दुर्घटना की स्थिति में लोग नुकसान की भरपाई का दावा नहीं कर सकते थे। ऐसे में अगर नई व्यवस्था के तहत इन इ-रिक्शों के भी नियमन के दायरे में लाया गया है, तो यह यात्रियों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा की दृष्टि से एक अनिवार्यता थी। यों भी, सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था सरकार की जिम्मेदारी है। इ-रिक्शों के नियमन के साथ यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि दिल्ली में ऐसे बहुत से इलाके हैं, जहां स्थानीय स्तर पर ‘शेयरिंग आॅटो’ चलाए जाते हैं, जिनमें निर्धारित संख्या या क्षमता से कहीं अधिक यात्रियों को बिठा कर उनसे मनमाना किराया वसूला जाता है। लोग उनमें जोखिम के साथ अपने गंतव्य की ओर जाने को मजबूर होते हैं। सरकार को इ-रिक्शों के नियमन के साथ-साथ सार्वजनिक परिवहन की समुचित व्यवस्था तय करनी चाहिए, ताकि किसी भी इलाके में रहने वाले लोग सुविधाजनक तरीके से अपने गंतव्य तक पहुंच सकें।

 

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App