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संपादकीय: संवेदनहीनता की हद

बाड़मेर के मुख्य चिकित्सा और स्वास्थ्य अधिकारी का कहना है कि गडरा रोड और बाड़मेर के बीच सौ किलोमीटर की दूरी में कहीं भी मुर्दाघर की सुविधा नहीं है। ऐसे में पुलिस और परिजनों के आग्रह पर मानवीय दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए पोस्टमार्टम किया गया।

Author September 29, 2018 2:28 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

राजस्थान के बाड़मेर जिले के एक गांव के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में खुले में दो महिलाओं के शवों का पोस्टमार्टम कर देने की जो अमानवीय घटना सामने आई है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाली है। इस घटना से यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं होगा कि लोगों के स्वास्थ्य का ध्यान रखने और चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराने की जिम्मेदारी संभालने वाला महकमा खुद किस कदर बीमार है। यह घटना बताती है कि जन-जन तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने का दावा करने वाली सरकार के राज में गांवों-कस्बों के चिकित्सा केंद्र कैसी बदहाली में हैं। यह घटना सरकार के विकास के दावों की कलई खोल देने के लिए काफी है। गौरतलब है कि मंगलवार को जिले के एक गांव में करंट लगने से दो महिलाओं की मौत हो गई थी। उनके शवों को जिले के गडरा रोड सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर रखा गया और फिर बुधवार देर शाम इनका पोस्टमार्टम किया गया। इस सामुदायिक केंद्र में शवगृह नहीं है, इसलिए दोनों शवों का पोस्टमार्टम परदे की आड़ बना कर खुले में सड़क पर कर दिया गया। इस घटना पर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने जो सफाई दी है, वह और भी शर्मसार कर देने वाली है। अफसर यह कहते हुए जरा भी नहीं झिझके कि यह कदम उन्होंने मानवीय आधार पर और परिवार की सहमति से उठाया।

यह घटना चौंकाने वाली इसलिए भी है कि राज्य में विधानसभा चुनाव सिर पर हैं और सरकार अपनी उपलब्धियों का बखान करते थक नहीं रही। पर हकीकत इन दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। राज्य में सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों के नाम पर इमारतें भले खड़ी कर दी गई हों, लेकिन भीतर के हालात किसी गंभीर बीमारी में पड़े व्यक्ति का जीवन बचाने के बजाय बच सकने वाले मरीजों की जान खतरे में डाल देते हैं। बाड़मेर जिले में चौबीस सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं। लेकिन ज्यादातर केंद्रों पर शवों को रखने और पोस्टमार्टम करने का अलग से कोई इंतजाम नहीं है। ऐसे में खुले में ही पोस्टमार्टम कर दिए जाते हैं। जहां अलग से अस्थायी तौर पर शवगृह बनाए भी गए हैं, वहां बिजली और साफ-सफाई तक की सुविधा नहीं है। स्थिति इतनी खराब है कि जिले के शिव उपखंड में स्थित सामुदायिक केंद्र में जो शव आते हैं उनकी चीर-फाड़ का काम सामने ही स्थित एक धर्मशाला की रसोई में होता है। इस रसोई में ही शव रखे जाते हैं। ऐसे तमाम प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं जिन्हें बने हुए बरसों हो चुके हैं, लेकिन किसी में भी शवों को सुरक्षित रखने का बंदोबस्त करने की जरूरत आज तक नहीं समझी गई।

बाड़मेर के मुख्य चिकित्सा और स्वास्थ्य अधिकारी का कहना है कि गडरा रोड और बाड़मेर के बीच सौ किलोमीटर की दूरी में कहीं भी मुर्दाघर की सुविधा नहीं है। ऐसे में पुलिस और परिजनों के आग्रह पर मानवीय दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए पोस्टमार्टम किया गया। उन्होंने यह दावा भी कर डाला कि इस दौरान सारे ‘प्रोटोकॉल’ का पालन किया गया है। एक अधिकारी का यह तर्क उसकी संवेदनहीनता को बताता है। यह तो एक जिले की दशा है। ऐसी स्थिति में यह समझना मुश्किल नहीं है कि लोगों को इलाज के लिए कहां-कहां धक्के खाने पड़ते होंगे, कैसी पीड़ा झेलनी पड़ती होगी! ग्रामीण आबादी इतनी संपन्न नहीं है कि वह इलाज कराने के लिए पास के शहर में जा सके। अपने परिजनों के शव लेकर पोस्टमार्टम के लिए भटकने वालों को किस संकट और मनोदशा से गुजरना पड़ता होगा, इस बारे में जरा नीति-निर्माताओं और विकास का दंभ भरने वालों को सोचना चाहिए।

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