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मंगलोर की मिसाल

जनसत्ता 1 अक्तूबर, 2014: संविधान की निगाह में भले सब बराबर हों, पर सामाजिक भेदभाव की रिवायत अनेक रूपों में कायम रही है। यह सबसे ज्यादा धार्मिक मामलों में नजर आती है। स्त्रियां हालांकि पुरुषों से अधिक धर्मपरायण दिखती हैं, पर धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराना पुरुषों का, वह भी एक खास जाति के पुरुषों का […]

Author October 1, 2014 11:52 am

जनसत्ता 1 अक्तूबर, 2014: संविधान की निगाह में भले सब बराबर हों, पर सामाजिक भेदभाव की रिवायत अनेक रूपों में कायम रही है। यह सबसे ज्यादा धार्मिक मामलों में नजर आती है। स्त्रियां हालांकि पुरुषों से अधिक धर्मपरायण दिखती हैं, पर धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराना पुरुषों का, वह भी एक खास जाति के पुरुषों का एकाधिकार रहा है। फिर स्त्री विधवा हो, तो धार्मिक ही नहीं, अन्य मांगलिक कार्यों से भी उसे दूर रखने की परंपरा, शिथिल भले हुई हो, किसी हद तक बनी रही है। समाज सुधार के आंदोलनों और संवैधानिक प्रावधानों के चलते दलितों के लिए मंदिरों में प्रवेश भले संभव हो गया हो, पर उनके जरिए समाज कोई धार्मिक-कार्य संपन्न कराए, यह अब भी सोच पाना मुश्किल है। पर कर्नाटक के मंगलोर जिले के एक मंदिर ने तीन रूढ़ियां एक साथ तोड़ी हैं, और देश में शायद ऐसा पहली बार हुआ है। जिले के कुडरोली स्थित गोकर्णनाथेश्वर मंदिर ने पुजारी के तौर पर दो दलित विधवाओं की नियुक्ति की है। पिछले साल भी वहां दो विधवाओं को पुजारी के काम के लिए चुना गया था, जो तब से यह जिम्मेदारी निभा रही थीं। मगर इस बार मंदिर के न्यास ने जाति का बंधन भी तोड़ दिया।

एक शताब्दी पुराने इस मंदिर के प्रबंध न्यासी समेत मंदिर समिति के सदस्यों ने दोनों स्त्रियों का द्वार पर आकर स्वागत किया और उन्हें ससम्मान मंदिर के भीतर ले गए। वहां दोनों नई पुजारिनों ने पूजा संपन्न की और वहां मौजूद लोगों को प्रसाद वितरित किया। इस अभिनव पदारोहण के आयोजन में पूर्व केंद्रीय मंत्री बी जनार्दन पुजारी ने भी शिरकत की। दूसरी तरफ बिहार का वह वाकया है, जिसमें मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने आरोप लगाया है कि उपचुनावों के दौरान मधुबनी के एक मंदिर में उनके दर्शन करके जाने के बाद वहां प्रतिष्ठापित मूर्तियों और उस स्थान को धोया गया। मांझी ने दरभंगा के मंडलायुक्त को इस मामले की जांच का आदेश दिया है। अलबत्ता अनेक स्थानीय लोगों के अलावा मंदिर-दर्शन के दौरान साथ रहे राज्य के ग्रामीण विकास मंत्री नीतीश मिश्र और जनता दल (एकी) के विधान परिषद सदस्य विनोद कुमार सिंह मुख्यमंत्री के आरोप से इत्तिफाक नहीं रखते। इस प्रसंग की सच्चाई जो हो, ऐसे कई उदाहरण हैं जब बहुत ऊंचे रसूख वाले व्यक्ति के साथ भी हिकारत-भरा भेदभाव हुआ है।

केंद्रीय मंत्री रहते हुए एक बार जगजीवन राम ने वाराणसी में संपूर्णानंद की मूर्ति पर माल्यार्पण किया था। कुछ लोगों को यह नागवार गुजरा और उन्होंने दूसरे रोज मूर्ति को धोकर ‘पवित्र’ किया। उसी शहर में वैसा ही वाकया तब हुआ, जब फारूक अब्दुल्ला ने महामना मदन मोहन मालवीय की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया था। शायद ऐसे कुछ और भी उदाहरण हों। लिहाजा, पवित्रता के नाम पर चली आ रही ओछी मानसिकता से मुक्ति पाने के सवाल पर विचार होना ही चाहिए। मंगलोर के गोकर्णनाथेश्वर मंदिर के न्यासियों ने समाज सुधारक नारायण गुरु से प्रेरणा ग्रहण की है, जो कहते थे कि ईश्वर की दृष्टि में सभी बराबर हैं। पर उत्तर भारत में भी यह संदेश देने वाले संतों की कमी नहीं रही है। कबीर के इस कथन से कौन अपरिचित होगा कि जात-पांत पूछे नहिं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई। घना, पीपा, रैदास जैसे दूसरे संतों को भी हम इस सिलसिले में याद कर सकते हैं। उनके दलित समुदाय से आने के बावजूद हमने उन्हें संत का दर्जा दिया। फिर धार्मिक या परंपरा से पवित्र माने जाने वाले अनुष्ठान दलितों के भी हाथ से संपन्न हों, यह हम क्यों नहीं सोचते!

 

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