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संपादकीयः सतर्कता की मुद्रा

रिजर्व बैंक ने लगातार चौथी बार नीतिगत दरों को यथावत रखा है, यानी ताजा द्विमासिक समीक्षा के बाद रेपो रेट सवा छह फीसद और रिवर्स रेपो रेट छह फीसद पर कायम है।

Author June 9, 2017 3:24 AM
भारतीय रिजर्व बैंक।

रिजर्व बैंक ने लगातार चौथी बार नीतिगत दरों को यथावत रखा है, यानी ताजा द्विमासिक समीक्षा के बाद रेपो रेट सवा छह फीसद और रिवर्स रेपो रेट छह फीसद पर कायम है। नीतिगत दरों में कटौती न किए जाने पर जहां उद्योग जगत ने निराशा जताई है, वहीं रिजर्व बैंक की मौद्रिक समीक्षा नीति (एमपीसी) का यह फैसला सरकार को भी नागवार गुजरा है। ताजा मौद्रिक समीक्षा को लेकर अलग-अलग राय हो सकती हैं, लेकिन जिस तरह से सरकार ने समीक्षा को प्रभावित करने की कोशिश की, उससे अच्छा संदेश नहीं गया है। खबर है कि समीक्षा बैठक से पहले वित्त मंत्रालय के आला अफसर एमपीसी के सदस्यों से मिलना चाहते थे। पर जैसा कि रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल के बयान से मालूम हुआ, एमपीसी ने ब्याज दरों पर चर्चा के लिए वित्त मंत्रालय के प्रतिनिधियों से मिलने से ही मना कर दिया। यह रिजर्व बैंक का सर्वथा उचित रुख है, और ऐसा करके उसने अपनी स्वायत्तता रेखांकित की है।

विडंबना यह है कि उर्जित पटेल के अब तक के कार्यकाल को रिजर्व बैंक की स्वायत्तता के क्षरण और उसकी निर्णय प्रक्रिया में सरकार के बेजा दखल के दौर के रूप में देखा जा रहा था। पर ऐसा लगता है कि अपने पूर्ववर्ती रघुराम राजन की तरह अब उर्जित पटेल को भी रिजर्व बैंक की संस्थागत स्वायत्तता की फिक्र सताने लगी है। सरकार ब्याज दरों में कटौती के लिए जितनी भी आग्रही रही हो, उसे एमपीसी के फैसले का सम्मान करना चाहिए। रिजर्व बैंक से ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद दो खास कारणों से की जा रही थी। एक यह कि खुदरा महंगाई दर काबू में है। दूसरे, केंद्रीय सांख्यिकी संगठन के हालिया आंकड़े बताते हैं कि औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर में कमी आई है। लेकिन रिजर्व बैंक को लगा कि थोड़ा और इंतजार करने की जरूरत है, जल्दबाजी में ऐसा कुछ नहीं किया जाना चाहिए जिससे बाद में कदम वापस खींचने पड़ें और किरकिरी हो। दरअसल, रिजर्व बैंक की निगाह में असल समस्या यह नहीं है कि ब्याज दरों में कटौती नहीं हो रही है बल्कि असल समस्या यह है कि नया निजी निवेश नहीं हो रहा है, बहुत सारी ढांचागत परियोजनाएं रुकी हुई हैं, लगातार एनपीए बढ़ते जाने के कारण बैंकों की सेहत ठीक नहीं है। ब्याज में कटौती के जरिए ऋणवृद्धि का आसान रास्ता चुनने के बजाय सरकार को वृद्धि के आड़े आ रही बाधाएं दूर करने पर ध्यान देना चाहिए। रिजर्व बैंक ने ताजा समीक्षा में कृषिऋण माफी को लेकर सरकार को आगाह करते हुए कहा है कि इससे राजकोषीय घाटे से निपटने की चुनौती और विकट हो जाएगी।

गौरतलब है कि इस महीने के शुरू में महाराष्ट्र सरकार ने छोटे और सीमांत किसानों के कर्ज माफ करने का आश्वासन दिया। इससे पहले, अप्रैल में उत्तर प्रदेश सरकार किसानों के छत्तीस हजार करोड़ रुपए के कर्ज माफ करने का एलान कर चुकी है। महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में उठे किसान आंदोलन के मद््देनजर कृषि-ऋण माफी की मांग व्यापक तथा तेज हो सकती है। रिजर्व बैंक की चेतावनी बहुत-से अर्थशास्त्रियों की राय से मेल खाती है। पर सवाल है कि जब कॉरपोरेट कर्ज माफ किए जाते हैं, उन कर्जों का ‘पुनर्गठन’ करके उन्हें भारी रियायतें दी जाती हैं, बहुत सारी रकम डूबी हुई मान कर बट््टे खाते में डाल दी जाती है, तब चेतावनी का ऐसा कड़ा स्वरक्यों नहीं सुनाई देता! रिजर्व बैंक को तो बड़े बकाएदारों के नाम उजागर करने में भी परेशानी महसूस होती है। अच्छा होता कि कृषिऋण माफी से सरकारी खजाने पर पड़ने वाले नकारात्मक असर की चेतावनी देने के साथ-साथ रिजर्व बैंक ने किसानों को उनकी उपज का वाजिब मूल्य दिलाने का कारगर उपाय भी सुझाया होता।

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