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संपादकीय: ट्रंप का फैसला

सीरिया से सैनिकों को बुलाने के पीछे ट्रंप ने तर्क दिया कि वहां अमेरिका का काम पूरा हो चुका, अमेरिकी सैनिक इसलामिक स्टेट (आइएस) का सफाया करने गए थे।

Author Editorial column on Trump decides, Is America Refrained from External Military Expedition | Published on: December 24, 2018 1:54 AM
अमेरिका ने अफगानिस्तान से सात हजार सैनिकों की वापसी का फैसला तालिबान के साथ शांति समझौते की कीमत पर किया।

दूसरे देशों में अपने सैनिकों को भेज कर लंबे समय तक अभियान चलाने वाले अमेरिका को अब हकीकत समझ में आने लगी है। इराक, सीरिया, अफगानिस्तान जैसे संकटग्रस्त देशों में अपनी सेना को फंसा देख ट्रंप ने जो कदम उठाने शुरू किए हैं, वे इस बात के पक्के संकेत हैं कि अब अमेरिका बाहरी सैन्य अभियानों से हार मान चुका है और उसे इसमें नुकसान ही ज्यादा हो रहा है। सीरिया से अमेरिकी सैनिकों की वापसी भी इसी वजह से हुई और अब आने वाले वक्त में अफगानिस्तान से भी सात हजार अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाने की तैयारी हो चुकी है। हालांकि सैनिकों की वापसी का फैसला अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए आसान इसलिए नहीं रहा होगा क्योंकि उनके रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस इस फैसले के पक्ष में नहीं थे। लेकिन ट्रंप जिद्दी प्रकृति के हैं। उन्होंने रक्षा मंत्री की एक नहीं सुनी। इस टकराव का नतीजा मैटिस के इस्तीफे के रूप में सामने आया। मैटिस ने सार्वजनिक तौर पर कह दिया है कि सैन्य और विदेश मामलों पर ट्रंप के साथ उनकी पटरी नहीं बैठ रही।

सैन्य और विदेश नीति से जुड़े गंभीर मुद्दों पर ट्रंप और मैटिस के बीच गहराते मतभेद अमेरिका की दशा-दिशा को बताने के लिए काफी हैं। इस वक्त विदेश नीति के मोर्चे पर अमेरिका को कई संकटों का सामना करना पड़ रहा है। सीरिया से सैनिकों को बुलाने के पीछे ट्रंप ने तर्क दिया कि वहां अमेरिका का काम पूरा हो चुका, अमेरिकी सैनिक इसलामिक स्टेट (आइएस) का सफाया करने गए थे। हालांकि अमेरिका इस बात को अच्छी तरह समझता है कि वह आइएस के लड़ाकों को तो मार सकता है, पर आइएस को खत्म नहीं कर सकता। सीरिया से अमेरिकी सैनिकों की वापसी से यह संदेश गया है कि अमेरिका वहां से पिंड छुड़ा कर भागा है। अमेरिका ने अफगानिस्तान से सात हजार सैनिकों की वापसी का फैसला तालिबान के साथ शांति समझौते की कीमत पर किया। आधे अफगानिस्तान पर तालिबान का ही कब्जा है और अमेरिका उसकी इस ताकत को समझता है। इसलिए अमेरिका ने तालिबान पर वार्ता के लिए दबाव बनाया और बदले में आधे अमेरिकी सैनिकोंको हटाने की बात कही। लेकिन तालिबान को रूस समर्थन देता रहा है। लेकिन शिकागो में हुई शांति वार्ता के बाद तालिबान ने अमेरिका को झटका दिया और आगे किसी वार्ता से इंकार कर दिया। ट्रंप के ये दांव गलत भी पड़ सकते हैं।

चीन से लेकर रूस तक से अमेरिका विवादों में उलझा है। अमेरिकी सैनिकों की वापसी से भारत और अफगानिस्तान दोनों पर असर पड़ेगा। अफगानिस्तान ने तो साफ कहा है कि ट्रंप का फैसला उसे गंभीर संकट में डालने वाला है। जैसे ही अमेरिकी फौज की वापसी होगी, अफगानिस्तान के सुरक्षा बलों को तालिबान लड़ाकों के बड़े हमले झेलने पड़ेंगे। ऐसे में अफगान सुरक्षा बलों की ताकत पर असर पड़ेगा और तालिबान ज्यादा मजबूत होकर उभरेगा। वह उन इलाकों पर कब्जे के लिए जंग छेड़ सकता है जो अफगानिस्तान की निर्वाचित सरकार के नियंत्रण वाले हैं। अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में भारत बड़ी भूमिका निभा रहा है। कई बड़ी परियोजनाएं भारत के सहयोग से ही चल रही हैं। ऐसे में अफगानिस्तान में भारत की मुश्किलें बढ़ेंगी। अमेरिका अर्थव्यवस्था सहित कई संकटों से जूझ रहा है। ऐसे में ट्रंप के लिए बेहतर है कि दूसरे देशों में टांग न फंसाएं।

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