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संपादकीय: तेल की धार

पिछले कुछ सालों से तेल की कीमतों में थोड़ी-थोड़ी बढ़ोतरी होते हुए जब पेट्रोल सौ रुपए प्रति लीटर के करीब पहुंचने लगा, तब सभी तबकों के बीच इसे लेकर असंतोष बढ़ा। कई जगहों पर इसके खिलाफ प्रदर्शन हुए और कहीं-कहीं अराजकता भी देखी गई।

Author October 6, 2018 1:30 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

गुरुवार को केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में जितनी कटौती की घोषणा की है, वह मौजूदा दरों को देखते हुए बेहद मामूली है। इसके बावजूद कहा जा सकता है कि तेल के दाम जिस गति से ऊपर की ओर जा रहे थे, उसमें सरकार की ताजा पहल आम लोगों के बीच राहत का एक संदेश जरूर दे सकती है। हालांकि यह कहना मुश्किल है कि पेट्रोल की कीमतें जिस तरह कई जगहों पर नब्बे रुपए और डीजल की पचासी रुपए प्रति लीटर तक चली गई थीं, उसमें केंद्र की ओर से प्रति लीटर ढाई रुपए की कटौती से लोगों को कितनी राहत मिल सकेगी। यों केंद्र सरकार ने राज्यों से भी आग्रह किया है कि वे तेल पर स्थानीय वैट की दरों में कटौती करें। अब देखना यह है कि राज्य सरकारें इस दिशा में कितना साहस कर पाती हैं। फिलहाल भाजपा शासित ज्यादातर राज्यों ने पेट्रोलियम उत्पादों पर राज्यस्तरीय करों में कटौती करने की घोषणा की है और इस वजह से पेट्रोल-डीजल की कीमतों में प्रति लीटर पांच रुपए तक की गिरावट आई है। लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि ताजा कटौती के बाद तेल की कीमतें अब स्थिर रहेंगी।

दरअसल, पिछले कुछ सालों से तेल की कीमतों में थोड़ी-थोड़ी बढ़ोतरी होते हुए जब पेट्रोल सौ रुपए प्रति लीटर के करीब पहुंचने लगा, तब सभी तबकों के बीच इसे लेकर असंतोष बढ़ा। कई जगहों पर इसके खिलाफ प्रदर्शन हुए और कहीं-कहीं अराजकता भी देखी गई। यह एक तरह से तेल की बेलगाम कीमतों की वजह से जीवन के दूसरे क्षेत्रों के प्रभावित होने से उपजा विरोध था। शायद इसलिए सरकार को इस मसले पर विशेष कदम उठाने की जरूरत महसूस हुई। यों करीब महीने भर पहले कहा गया था कि तेल की कीमतों पर लगाम लगाना सरकार के हाथ में नहीं है और यह पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय बाजार में चढ़ती-उतरती दरों से प्रभावित होता है। जाहिर है, अगर अकेला कारण यही है तो सरकार की ओर से उत्पाद शुल्क में ताजा कटौती के बाद भी यह कहना मुश्किल है कि कीमतों पर कोई दीर्घकालिक अंकुश लग पाएगा। लेकिन अब सरकार ने इस मसले की गंभीरता का अंदाजा लगाते हुए अपनी ओर से जिस तरह कटौती की है, उससे यह भी साफ हुआ कि सरकार चाहे तो तेल के कारोबार में अपने हिस्से की भूमिका का आकलन करके उसकी कीमतों पर असर डाल सकती है।

यह एक जगजाहिर तथ्य है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें समूचे बाजार में मौजूद सभी वस्तुओं के दामों को प्रभावित करती हैं। आज खाने-पीने तक के सामान के दाम और बाकी चीजों की महंगाई का चढ़ता ग्राफ भी अगर आम लोगों के लिए बड़ी समस्या बन चुका है तो इसकी जड़ में पेट्रोल और डीजल की कीमतें मुख्य कारक हैं। इसे केवल तेल की जरूरतों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता है। विडंबना यह है कि जब डीजल के दाम में बढ़ोतरी होती है तो उसी के मुताबिक वस्तुओं की ढुलाई से लेकर लोगों की कहीं आवाजाही वाले सार्वजनिक परिवहन के किराए भी बढ़ा दिए जाते हैं। लेकिन शायद ही कभी ऐसा होता है कि जब तेल की कीमतों में कमी होती है तो उसी मुताबिक ढुलाई या किरायों में कमी हो जाए। तो यह देखना होगा कि पेट्रोल और डीजल के दाम में करीब पांच रुपए मामूली कटौती से बाजार में जरूरी वस्तुओं के मूल्य और आवाजाही के खर्च में कितनी कमी आती है। ताजा कटौती के असर का मूल्यांकन इसी कसौटी पर होना है।

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