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संपादकीयः राहत के बावजूद

इस वक्त अपने गांव लौटे मजदूरों के सामने सबसे विकट समस्या है। एक तरफ तो उनका आमदनी का जरिया खत्म हो गया है और दूसरी तरफ उन्हें उसी ठीये पर पैर जमाने की कोशिश करनी है, जहां की बदहाल स्थितियों से परेशान होकर वे शहरों की तरफ गए थे।

इस वक्त अपने गांव लौटे मजदूरों के सामने सबसे विकट समस्या है।

प्रधानमंत्री सहायता कोष यानी पीएम केयर्स से एक हजार करोड़ रुपए की मदद मजदूरों को पहुंचाने की घोषणा की गई है। यह रकम स्वतंत्र रूप से सिर्फ शहरों से बेरोजगार होकर अपने गांव पहुंचने वाले मजदूरों के लिए है। निश्चय ही इससे उन्हें बड़ी राहत मिलेगी। मगर यह मदद राज्य सरकारों की मार्फत उन्हें मिलनी है, इसलिए उनकी संजीदगी पर निर्भर है कि वे मजदूरों तक इसका कितना लाभ पहुंचा पाती हैं। पूर्णबंदी के तीसरे चरण में मजदूरों की घरवापसी तेजी से बढ़ी। चिलचिलाती धूप में उन्हें सड़कों पर पैदल, साइकिलों से या फिर ट्रकों वगैरह में छिप कर लौटते देखना एक त्रासद अनुभव है। ऐसे में कुछ राज्य सरकारों ने उनकी वापसी के लिए रेलें चलाने का फैसला किया और धीरे-धीरे विशेष गाड़ियां चलनी शुरू हुर्इं, राज्य सरकारों ने विशेष बस सेवाएं भी शुरू की। मगर बिहार सरकार अब भी इसी पक्ष में है कि जो लोग जहां हैं, वहीं रहें, उन्हें वापस न लौटने दिया जाए। जांच वगैरह के मामले में भी बिहार सरकार की तैयारियों पर अंगुलियां उठ रही हैं। ऐसे में पीएम केयर्स का पैसा वहां किस रूप में और कितना सही हकदारों तक पहुंच पाएगा, कहना मुश्किल है।

इस वक्त अपने गांव लौटे मजदूरों के सामने सबसे विकट समस्या है। एक तरफ तो उनका आमदनी का जरिया खत्म हो गया है और दूसरी तरफ उन्हें उसी ठीये पर पैर जमाने की कोशिश करनी है, जहां की बदहाल स्थितियों से परेशान होकर वे शहरों की तरफ गए थे। शहरों में रहते हुए जो कुछ उन्होंने कमाया था, वह सब कुछ वे गंवा चुके हैं। गांव लौट कर भी उन्हें किस तरह दो जून की रोटी नसीब होगी, इसकी चिंता बनी हुई है। ऐसे में पीएम केयर्स का पैसा अगर सीधे उन तक पहुंचाने का प्रयास किया जाता है, तो उनके लिए बड़ी मदद होगी। मगर अभी तक इन मजदूरों की सही पहचान, इनका पंजीकरण आदि नहीं हो पाया है, जिसके चलते उन्हें मदद पहुंचाने में सरकारों को अड़चन आ सकती है। ऐसे वक्त में राज्य सरकारों की संजीदगी की जरूरत है कि वे कैसे वापस लौटे मजदूरों की दशा सुधारने के लिए व्यावहारिक कदम उठाएं। पूर्णबंदी के समय के अनुभवों से कुछ सबक मिले हैं। राज्य सरकारों ने गरीबों के लिए भोजन आदि का प्रबंध किया, कुछ नगदी भी उनके खातों में डाली गई, मगर जिन लोगों का पंजीकरण नहीं था, उन तक वह मदद नहीं पहुंच सकी। वे खैरात के भोजन के भरोसे ही जिंदा रहने का प्रयास करते रहे। वही समस्याएं पीएम केयर्स से मिली मदद के आबंटन में भी आ सकती हैं।

इस वक्त राज्य सरकारों के सामने दोहरी चुनौती है कि किस तरह कोरोना संक्रमण को फैलने से रोका जाए और दूसरी तरफ किसी को भूख और बदहाली से न मरने दिया जाए। जिस तादाद में प्रवासी मजदूर अपने घरों को लौट रहे हैं, उनसे गांवों में संक्रमण फैलने का खतरा निस्संदेह बढ़ गया है, पर उन्हें बदहाली में बंद करके कहीं और नहीं रखा जा सकता। पीएम केयर्स से मिले पैसे को ईमानदारी से इन मजदूरों की सेहत और पोषण पर खर्च करने के व्यावहारिक कदम उठाने होंगे। अपने घरों को लौट रहे लोगों की पहचान करना मुश्किल काम नहीं है। ग्राम पंचायतों, पटवारी वगैरह को इस काम में लगा कर जल्दी से सूची तैयार कर उन्हें मदद मुहैया कराने का काम होना चाहिए। बिहार सरकार जैसी निष्क्रियता इन मजदूरों की बदहाली और बढ़ाएगी।

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