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उम्मीद की सूरत

जनसत्ता 14 नवंबर, 2014: पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र ने एक बार फिर बढ़ते वैश्विक तापमान और उसके संभावित असर को लेकर दुनिया को आगाह किया था। हालांकि इस गहराती समस्या को लेकर विकसित देशों के अब तक के रुख को देखते हुए इसमें किसी बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं की जाती थी। पर बुधवार को […]
Author November 14, 2014 12:27 pm

जनसत्ता 14 नवंबर, 2014: पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र ने एक बार फिर बढ़ते वैश्विक तापमान और उसके संभावित असर को लेकर दुनिया को आगाह किया था। हालांकि इस गहराती समस्या को लेकर विकसित देशों के अब तक के रुख को देखते हुए इसमें किसी बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं की जाती थी। पर बुधवार को इस परिदृश्य में एक बड़ा फेर-बदल हुआ, जब कार्बन डाइआॅक्साइड के उत्सर्जन में कटौती को लेकर अमेरिका और चीन ने आपस में एक समझौता किया। इसके तहत अमेरिका 2025 तक अपने यहां कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन का स्तर 2005 के आंकड़े तक लाना चाहता है।

यानी इसके लिए उसे अपने मौजूदा उत्सर्जन में छब्बीस से अट्ठाईस फीसद की कटौती करनी होगी। दूसरी ओर, चीन 2030 तक कार्बन डाइआॅक्साइड के उत्सर्जन के मामले में निर्धारित लक्ष्य हासिल करने के लिए अपनी प्रारंभिक ऊर्जा खपत में गैर-जीवाश्म र्इंधन की साझेदारी करीब बीस फीसद तक बढ़ाना चाहेगा। यानी वह इसके लिए शून्य-उत्सर्जन वाले परमाणु, वायु, सौर ऊर्जा स्रोतों की ओर रुख करेगा। जाहिर है, अमेरिका और चीन के बीच हुआ ताजा समझौता पारिस्थितिकी संतुलन को दीर्घकालिक व्यापक नुकसान पहुंचाने के लिए जिम्मेदार ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन घटाने की दिशा में एक अहम पड़ाव है। अगर यह समझौता सचमुच अमल में आया तो भविष्य में वैश्विक तापमान की बढ़त तीन डिग्री तक सीमित रहने की उम्मीद की जा सकती है।

अब तक अमेरिका जैसे कई विकसित देश पृथ्वी का तापमान बढ़ाने वाली गैसों का उत्सर्जन कम करने से इस दलील पर साफ इनकार करते रहे हैं कि इससे उनके देश की विकास दर घट जाएगी। इस मामले में वे क्योतो प्रोटोकॉल तक को मानने से इनकार करते रहे हैं। लेकिन वैश्विक तापमान के मसले पर होने वाले वैश्विक सम्मेलनों में विकासशील देशों पर दबाव बनाया जाता रहा है कि वे कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कम करें। दूसरी ओर, इसी तर्क पर भारत, ब्राजील समेत विकासशील और अल्पविकसित देशों का समूह गैसों में कटौती के खिलाफ है। उनका कहना है कि विकसित देशों की बराबरी करने और अपने यहां गरीबी मिटने तक वे इन गैसों का उत्सर्जन कम नहीं कर सकते।

लेकिन जाहिर है कि अमेरिका और चीन के बीच ताजा समझौते के बाद स्थितियां बदलेंगी और भारत के सामने भी अपने रुख पर विचार करने का दबाव बढ़ सकता है। खासतौर पर तब जब भारत में जलवायु के मसले पर चीन के साथ पुरानी साझेदारी से खुद को अलग करने की जरूरत पर बहस चल रही है। गौरतलब है कि 2012 के एक सर्वेक्षण के मुताबिक सबसे ज्यादा जीवाश्म र्इंधन का उत्सर्जन करने वाले देशों में चीन की भागीदारी सत्ताईस फीसद, अमेरिका की चौदह और यूरोपीय संघ की दस फीसद है। भारत प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के मामले में फिलहाल अमेरिका के दसवें और चीन के एक चौथाई हिस्से के बराबर है। लेकिन अगर इसने गैर-जीवाश्म र्इंधन का रुख नहीं किया तो 2020 से 2040 के बीच वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में इसकी हिस्सेदारी अपेक्षा से ज्यादा हो सकती है। अब देखना है कि अगले महीने बिजली उत्पादन के लिए जीवाश्म र्इंधन के उपयोग को पूरी तरह खत्म करने के मसले पर लीमा में संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी समिति की बैठक और फिर अगले साल पेरिस में होने वाले जलवायु परिवर्तन के समझौते पर अमेरिका और चीन के बीच बनी ताजा सहमति का क्या असर पड़ता है।

 

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