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त्रासदी के शिविर

पंजाब के गुरदासपुर में एक गैर-सरकारी संगठन की ओर से लगाए गए आंखों के मुफ्त आॅपरेशन शिविर में कई लोगों की आंखों की रोशनी चले जाने की जो त्रासदी सामने आई है, वह नई नहीं है। लेकिन इससे फिर यही जाहिर हुआ है कि सेवा या इलाज के नाम पर पैसा कमाने के लिए कुछ […]

Author December 6, 2014 12:02 PM

पंजाब के गुरदासपुर में एक गैर-सरकारी संगठन की ओर से लगाए गए आंखों के मुफ्त आॅपरेशन शिविर में कई लोगों की आंखों की रोशनी चले जाने की जो त्रासदी सामने आई है, वह नई नहीं है। लेकिन इससे फिर यही जाहिर हुआ है कि सेवा या इलाज के नाम पर पैसा कमाने के लिए कुछ स्वयंसेवी संगठन किस हद तक चले जाते हैं। गुरदासपुर जिले के घुमान गांव में लगाए गए इस शिविर की हालत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मोतियाबिंद के ऑपरेशन के लिए इस्तेमाल में लाए गए यंत्रों को संक्रमणरहित बनाने के कोई उपाए नहीं किए गए थे, ऑपरेशन के बाद खड़ी होने वाली परेशानी से निपटने के इंतजाम पहले करना जरूरी नहीं समझा गया। वहां बुलाए गए डॉक्टरों ने आनन-फानन में साठ लोगों का मोतियाबिंद का ऑपरेशन कर दिया।

लेकिन इसके कुछ ही घंटों के बाद कई लोगों की आंखों में दर्द होने लगा और जब तक वे अस्पताल पहुंचते, तब तक काफी देर हो चुकी थी। करीब डेढ़ दर्जन लोगों की आंखों की रोशनी हमेशा के लिए चली गई। कुछ खबरों के मुताबिक यह संख्या साठ तक है। ऐसा लगता है कि जिस संस्था ने यह शिविर लगाया था, उसे सिर्फ एक औपचारिकता पूरी करनी थी, ताकि अपनी इस कथित सेवा के नाम पर अनुदान देने वाली एजेंसियों से धनराशि और सुविधाएं हासिल की जा सकें। खबरों के मुताबिक इस शिविर के लिए प्रशासन से इजाजत नहीं ली गई थी। निश्चित रूप से यह नियम-कायदों का उल्लंघन है। अब प्रशासन की ओर से कहा जा रहा है कि चिकित्सा शिविर लगाने वालों पर आपराधिक मामला दर्ज किया जाएगा और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। लेकिन सवाल है कि इस शिविर की भनक प्रशासन को कैसे नहीं लग पाई, जबकि ऐसे आयोजन का कई दिन पहले से प्रचार होता रहता है?

इस तरह की आपराधिक लापरवाही केवल निजी संगठनों की ओर से लगाए जाने वाले चिकित्सा शिविरों में नहीं होती। ज्यादा दिन नहीं हुए जब छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में सरकारी परिवार नियोजन कार्यक्रम के तहत महिलाओं की नसबंदी के लिए आयोजित एक शिविर में डॉक्टरों ने महज पांच घंटे में तिरासी ऑपरेशन कर डाले। उनमें से बहुत-सी महिलाओं की स्थिति बिगड़ गई और ग्यारह की मौत हो गई। जाहिर है, गैर-सरकारी संगठनों की ओर से ऐसे शिविर आयोजित करने का मकसद जहां सरकारी योजनाओं के तहत मिलने वाले अनुदान हासिल करना होता है, वहीं सत्ताधारी राजनीतिक पार्टियां गरीब परिवारों को चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराने के बजाय ऐसे मौकों का इस्तेमाल अपने प्रचार के लिए करती हैं।

यह छिपा नहीं है कि ऐसे चिकित्सा शिविरों में आमतौर पर वही लोग जाते हैं, जो आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं। अगर वे इस तरह की लापरवाही का शिकार होकर जान गंवाते हैं या उनके शरीर का कोई अंग स्थायी रूप से बेकार हो जाता है तो भी किसी का कुछ नहीं बिगड़ता। दर्जनों लोगों के आंख या जान गंवाने के मामले सामने आने के बाद सरकार पीड़ित परिवारों को कुछ मुआवजा देकर आमतौर पर मामले को रफा-दफा कर देती है और फिर सब कुछ पहले की तरह चलता रहता है। भारत में हर साल लाखों लोग ऐसी बीमारियों की चपेट में आकर दम तोड़ देते हैं जिनका आसानी से इलाज संभव है। पर शायद इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि बहुत-से लोग इलाज की भेंट चढ़ जाते हैं!

 

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