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स्वीकारोक्ति का तकाजा

उत्तराखंड की जलविद्युत परियोजनाओं की बाबत सर्वोच्च न्यायालय में दिए केंद्र सरकार के हलफनामे से एक बार फिर पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठे हैं। इस हलफनामे में केंद्र ने स्वीकार किया है कि उत्तराखंड में पिछले साल आई बाढ़ को और तीव्र बनाने में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जलविद्युत परियोजनाओं की […]

Author December 11, 2014 2:08 PM
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उत्तराखंड की जलविद्युत परियोजनाओं की बाबत सर्वोच्च न्यायालय में दिए केंद्र सरकार के हलफनामे से एक बार फिर पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठे हैं। इस हलफनामे में केंद्र ने स्वीकार किया है कि उत्तराखंड में पिछले साल आई बाढ़ को और तीव्र बनाने में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जलविद्युत परियोजनाओं की अहम भूमिका रही। इससे पहले केंद्र इस सच को स्वीकार करने से बचता रहा। इस आपदा में सैकड़ों लोग मारे गए थे और बड़े पैमाने पर तबाही हुई थी।

तभी पर्यावरणविदों ने यह कहा था कि अगर पारिस्थितिकी को नजरअंदाज कर इस हिमालयी क्षेत्र में ढेर सारे बांध न बनाए गए होते और नदियों के ऐन किनारे तक निर्माण-कार्यों की इजाजत न दी गई होती, तो आपदा इतनी भयावह न होती। इजाजत दी जाने के पहले से वे आगाह करते आ रहे थे। पर उन्हें लगातार अनसुना किया जाता रहा। उत्तराखंड के जल-प्रलय ने सारे देश को स्तब्ध करने के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय को भी चिंता में डाल दिया। न्यायालय ने उत्तराखंड में जलविद्युत की प्रस्तावित उनतालीस में से चौबीस परियोजनाओं पर रोक लगा दी। कुछ लोगों को यह आदेश विकास में अड़ंगा डालने वाला लगा। पर अदालत ने एक बार फिर साफ किया है कि उसका मकसद बस यह सुनिश्चित करना है कि संबंधित परियोजनाओं से पर्यावरण को कोई खास नुकसान नहीं होगा; पिछले साल जून में जो हुआ उसे देखते हुए सब कुछ पहले की तरह चलते रहने नहीं दिया जा सकता।

इसीलिए अदालत ने स्थगन आदेश से प्रभावित हर परियोजना के पर्यावरणीय असर का अलग-अलग आकलन रिपोर्ट देने को कहा था। पर पर्यावरण मंत्रालय ने अठारह महीनों के बाद भी आकलन नहीं सौंपा है। न मंत्रालय इस सवाल का कोई जवाब दे सका है कि उसके हलफनामे के अनुसार जिन जलविद्युत परियोजनाओं ने राज्य के पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुंचाई, उनके पर्यावरणीय असर का मूल्यांकन किस तरह किया गया था, मंजूरी कैसे दी गई थी। शायद यह पहला मौका है जब केंद्र ने सर्वोच्च अदालत में शपथपत्र देकर जलविद्युत परियोजनाओं से पर्यावरणीय संकट उत्पन्न होने की हकीकत स्वीकार की है।

पर सवाल है कि क्या इस स्वीकारोक्ति से उसके रवैए में कोई फर्क आएगा? उत्तराखंड की जिन परियोजनाओं को आपदा-कारक माना गया, उन्हें पर्यावरणीय मंजूरी यूपीए सरकार के दौरान मिली थी। इसलिए कांग्रेस अपनी जवाबदेही से पल्ला नहीं झाड़ सकती। पर इस कटु अनुभव से कुछ सीखने के बजाय भाजपा उसी दिशा में ज्यादा रफ्तार से चलना चाहती है। पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर जब-तब दोहराते रहते हैं कि पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया और तेज की जाएगी। इसके लिए वनाधिकार अधिनियम सहित पर्यावरण संरक्षण के लिए बने कानूनों को कमजोर करने की भी तैयारी चल रही है।

टीएसआर सुब्रमण्यम समिति ने पिछले महीने अपनी जो रिपोर्ट सरकार को सौंपी है उसमें एक प्रमुख सुझाव यह भी है कि पर्यावरणीय मंजूरी के सरकार के फैसलों को न्यायिक समीक्षा के परे रखा जाए। अगर इसे स्वीकार कर लिया गया तो इसका नतीजा बहुत खतरनाक होगा, इसलिए भी कि परियोजनाओं के पर्यावरणीय असर का आकलन करने और उन्हें स्वीकृति देने की प्रक्रिया पर नजर रखने के लिए न केंद्र में कोई नियामक तंत्र है न राज्यों में। फिर, अनेक क्षेत्रों में जब नियामक के रहते हुए, शर्तों और नियमों के उल्लंघन के खिलाफ अदालत में फरियाद की जा सकती है, तो पर्यावरण के मामले में यह न्यायिक अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए? सुब्रमण्यम समिति की रिपोर्ट पर सरकार का रुख अभी जाहिर नहीं हुआ है।

पर जब उत्तराखंड की आपदा को व्यापक बनाने में जलविद्युत परियोजनाओं का हाथ होना सरकार ने स्वीकार किया है, तो वह प्रस्तावित परियोजनाओं का अलग-अलग पर्यावरणीय आकलन पेश करने और स्वीकार्य समाधान निकालने से क्यों कतरा रही है?

 

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