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विवाद का प्रसारण

जनसत्ता 4 अक्तूबर, 2014: दूरदर्शन से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के भाषण के सीधे प्रसारण ने स्वाभाविक ही एक तीखे विवाद को जन्म दिया है। कांग्रेस, भाकपा और माकपा सहित कई पार्टियों ने इस प्रसारण पर वरोध जताया है। रामचंद्र गुहा जैसे जाने-माने इतिहासकार और चिंतक ने भी इसे सरकारी संसाधन का […]

Author Published on: October 4, 2014 11:02 AM

जनसत्ता 4 अक्तूबर, 2014: दूरदर्शन से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के भाषण के सीधे प्रसारण ने स्वाभाविक ही एक तीखे विवाद को जन्म दिया है। कांग्रेस, भाकपा और माकपा सहित कई पार्टियों ने इस प्रसारण पर वरोध जताया है। रामचंद्र गुहा जैसे जाने-माने इतिहासकार और चिंतक ने भी इसे सरकारी संसाधन का दुरुपयोग करार दिया है। वर्ष 1925 में, जब संघ की स्थापना हुई, तब से दशहरे के दिन संघ का यह सालाना आयोजन होता आया है। पर पहली बार दूरदर्शन ने सरसंघचालक के भाषण का पूरा और सीधा प्रसारण किया। वाजपेयी सरकार के दौरान भी संघ प्रमुख को ऐसी अहमियत दूरदर्शन ने नहीं दी थी। फिर, अब उसे यह क्यों जरूरी लगा कि भागवत का पूरा भाषण देश को सुनाया-दिखाया जाए? इससे पहले संघ की दशहरा रैली की खबरें दूरदर्शन और आकाशवाणी से आती जरूर थीं, पर वे संघ प्रमुख के भाषण की दो-चार खास बातों तक सीमित रहती थीं। पर अब दूरदर्शन ने उन्हें वैसा महत्त्व दिया जैसा राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को मिलता रहा है। जाहिर है, सरकार के इशारे या परोक्ष आदेश के बिना यह नहीं हो सकता था। साफ है कि प्रसार भारती ने राजनीतिक दबाव के आगे घुटने टेक दिए हैं। उसने यह तक नहीं सोचा कि इस प्रसारण को उदाहरण बना कर किसी दिन दूसरे धार्मिक पहचान वाले संगठन भी ऐसी सहूलियत की मांग कर सकते हैं। क्या वह यह जोखिम उठाने को तैयार है? ऐसे लोगों के सीधे प्रसारण के क्या खतरे हो सकते हैं, क्या उसे इसका अहसास नहीं है?

संघ कैसा संगठन रहा है, यह किसी से छिपा नहीं है। भागवत के हाल के भी बयान बताते हैं कि वे भारत की धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीयता की संविधान की बुनियादी मान्यता में विश्वास नहीं करते। फिर सरकारी पैसे से चलने वाला चैनल उनके भाषण को इतनी अहमियत दे, यह एक खतरनाक रुझान है और यह अंदेशा पैदा करता है कि दूरदर्शन का ऐसा इस्तेमाल आगे भी हो सकता है। विडंबना यह है कि विपक्ष में रहते हुए भाजपा दूरदर्शन की बाबत सरकारी हस्तक्षेप को कोसते हुए थकती नहीं थी। पर अब उसे इस संस्थान का खुलकर सियासी इस्तेमाल करने में तनिक संकोच नहीं है! अप्रैल में, लोकसभा चुनावों के दौरान नरेंद्र मोदी के एक साक्षात्कार को दूरदर्शन पर संपादित करके दिखाए जाने पर भाजपा ने तत्कालीन सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। तब मोदी ने इस मामले को इमरजेंसी की याद दिलाने वाला कहा था। प्रसार भारती के प्रमुख जवाहर सरकार ने तब के सूचना एवं प्रसारण मंत्री को पत्र लिख कर कहा था कि इस तरह के विवाद उठने की मूल वजह यह है कि इस संस्था को वास्तविक स्वायत्तता हासिल नहीं है। साथ ही उन्होंने प्रसार भारती बोर्ड के सदस्यों से अपील की थी कि वे इस सरकारी प्रसारण संस्थान को अधिक स्वायत्तता देने की मांग उठाएं।

अब प्रसार भारती के प्रमुख स्वायत्तता का सवाल क्यों नहीं उठा रहे हैं? खबरों के मामले में दूरदर्शन और आकाशवाणी को सरकारी दखलंदाजी से मुक्त रखने के मकसद से करीब ढाई दशक पहले प्रसार भारती अधिनियम बना, पर इसे अपेक्षित स्वायत्तता कभी हासिल नहीं हो पाई। असल में जब तक दूरदर्शन के अधिकारियों की नियुक्ति, तबादले, पदोन्नति के अधिकार सरकार के हाथ में रहेंगे तब तक प्रसार भारती के गठन का मकसद पूरा नहीं सकेगा। इसलिए यह मांग की जाती रही है कि वित्तीय जरूरत के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय पर इसकी निर्भरता खत्म की जाए, इसे नियुक्तियों और तबादलों के भी अधिकार दिए जाएं। सरकार से इसके संबंध वैसे ही हों जैसे नियंत्रक एवं महा लेखा परीक्षक के हैं। ये सुझाव मोदी के साक्षात्कार संबंधी विवाद के बाद खुद प्रसार भारती के प्रमुख दोहरा चुके हैं। अब वे खामोश क्यों हैं?

 

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