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खाली खाते

हमारे देश में योजनाएं बड़े उत्साह से बनाई और घोषित की जाती हैं, पर उनके कारगर क्रियान्वयन की परवाह नहीं की जाती। यही कारण है कि तमाम योजनाएं अपना मकसद पूरा कर पाने में नाकाम रही हैं। प्रधानमंत्री ने स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए समूची आबादी को […]

Author November 20, 2014 1:44 AM

हमारे देश में योजनाएं बड़े उत्साह से बनाई और घोषित की जाती हैं, पर उनके कारगर क्रियान्वयन की परवाह नहीं की जाती। यही कारण है कि तमाम योजनाएं अपना मकसद पूरा कर पाने में नाकाम रही हैं। प्रधानमंत्री ने स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए समूची आबादी को बैंकिंग-सुविधा के दायरे में लाने का इरादा जताया था। इसके कुछ दिन बाद प्रधानमंत्री जन धन योजना की शुरुआत हुई। यों यह कोई नई पहल नहीं थी। यूपीए सरकार के समय ही वित्तीय समावेशन के नाम से यह अभियान शुरू हो गया था, और इसी का नतीजा था कि पिछले वित्तवर्ष में छह करोड़ नो-फ्रिल यानी मामूली रकम से शुरू किए जा सकने वाले खाते खोले गए। अलबत्ता जन धन योजना काफी धूम-धड़ाके से शुरू हुई। इसके प्रचार में मोदी सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी। प्रधानमंत्री के अलावा बीस मुख्यमंत्रियों, कई केंद्रीय मंत्रियों और बहुत-से सांसदों ने जन धन योजना के उद्घाटन समारोहों में शिरकत की। पहले ही दिन डेढ़ करोड़ खाते खुलने का दावा किया गया, जो कि एक विश्व-कीर्तिमान था। हालांकि यह साफ नहीं था कि पहले खोले गए नो-फ्रिल खातों का आंकड़ा इसमें शामिल था या नहीं। लेकिन इस योजना की हकीकत क्या है?

सूचनाधिकार के तहत मांगी गई जानकारी से खुलासा हुआ है कि चौहत्तर फीसद जन धन खातों में कोई बैलेंस नहीं है। वित्तीय सेवा विभाग की ओर से मुहैया कराए गए आंकड़ों के अनुसार,सात नवंबर तक इस योजना के तहत सात करोड़ दस लाख खाते खोले गए। इनमें से पांच करोड़ तीस लाख खातों में कोई पैसा नहीं था। यह तथ्य हैरान करने वाला है, पर पहले का अनुभव भी इससे अलग नहीं था। यूपीए सरकार के समय जो नो-फ्रिल खाते खोले गए, बाद में पाया गया कि उनमें से ज्यादातर निष्क्रिय ही रहे। जाहिर है, जन धन योजना से कुछ खास हासिल हुआ हो या नहीं, बैंकों का काम जरूर बढ़ गया। इतने बड़े पैमाने पर खातों के शून्य बैलेंस के होने की वजह यह हो सकती है कि लोगों को इनके जरिए कोई फौरी राहत मिलने की उम्मीद नहीं दिखी होगी। दूसरा कारण जागरूकता का अभाव भी हो सकता है। जो हो, इन खातों के जरिए वित्तीय समावेशन का जो दम भरा गया था, वह खोखला नजर आने लगा है। हो सकता है कि खासकर बीपीएल परिवारों को मिलने वाली सबसिडी इन खातों में भेजी जाने लगे। फिर ये शून्य बैलेंस वाले न रहें। मगर जिनका कोई बैंक-खाता नहीं है उनका खाता खुल जाने को ही वित्तीय समावेशन कहना निहायत बेतुका है।

सही मायने में वित्तीय समावेशन तब माना जाएगा जब संतोषजनक या न्यायसंगत आर्थिक भागीदारी हासिल हो। क्या खाते खुल जाने से बेरोजगारी दूर हो जाएगी, या तमाम बीपीएल परिवार गरीबी रेखा से ऊपर आ जाएंगे? अगर इन खातों से ऐसा चमत्कार हो, तो फिर बेरोजगारी और गरीबी दूर होने में सिर्फ नौ महीनों का वक्त लगेगा, क्योंकि जन धन योजना के मुताबिक अगले साल पंद्रह अगस्त के बाद कोई भी परिवार बिना बैंक-खाते के नहीं होगा। प्रधानमंत्री ने इस योजना की शुरुआत करते हुए इसे अमीरी और गरीबी की खाई पाटने वाला कहा था। यह खाई कितनी पटी है? इस तरह की हवाई बातें करने के बजाय सरकार को योजना की खामियां दूर करने पर ध्यान देना चाहिए। यह भी जरूरी है कि योजना को सही परिप्रेक्ष्य में पेश किया जाए। अतिरंजित बातों से देर-सबेर सिर्फ मोहभंग की स्थिति पैदा होती है।

 

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