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जन्म मरण

एक तरफ चिकित्सा-सुविधा को सार्वभौम अधिकार बनाने की बात हो रही है, और दूसरी तरफ आए दिन चिकित्सा उपकरणों और चिकित्सकों की कमी के चलते अस्पतालों में लोगों के बेमौत मरने की खबरें भी आ रही हैं। क्या इसी तरह इलाज का हक एक नागरिक अधिकार बनेगा? छत्तीसगढ़ के नसबंदी कांड की चर्चा थमी भी […]

Author December 11, 2014 2:05 PM

एक तरफ चिकित्सा-सुविधा को सार्वभौम अधिकार बनाने की बात हो रही है, और दूसरी तरफ आए दिन चिकित्सा उपकरणों और चिकित्सकों की कमी के चलते अस्पतालों में लोगों के बेमौत मरने की खबरें भी आ रही हैं। क्या इसी तरह इलाज का हक एक नागरिक अधिकार बनेगा? छत्तीसगढ़ के नसबंदी कांड की चर्चा थमी भी नहीं कि राज्य के एक अस्पताल में महज एक हफ्ते के भीतर सोलह नवजात शिशुओं की मौत होने की खबर आ गई।

बिलासपुर के सीआइएमएस यानी छत्तीसगढ़ चिकित्सा विज्ञान संस्थान में जन्म लेने के कुछ दिनों के भीतर सोलह बच्चों की मौत हो जाने के बावजूद ऐसा लगता है कि राज्य की भाजपा सरकार के कान पर जूं नहीं रेंगी है। एक ओर, सीआइएमएस के डॉक्टरों का साफ कहना है कि अस्पताल और इसके नवजात शिशु विभाग में जरूरी सुविधाएं नहीं हैं और मरीजों को देखने के लिए चिकित्सकों के बजाय प्रशिक्षुओं से काम चलाया जा रहा है। दूसरी ओर, इस त्रासद वाकये के बाद भी राज्य के स्वास्थ्य मंत्री बिना किसी संकोच के यह कहते हैं कि इसमें अस्पताल या डॉक्टरों का कोई दोष नहीं है; कोई भी निजी अस्पताल ऐसे बच्चों को अपने यहां भर्ती नहीं करता; बच्चों की हालत गंभीर होने पर ही लोग सीआइएमएस में लेकर आए।

बिलासपुर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने तो यहां तक कह डाला कि यह महिला एवं बाल विकास विभाग की जिम्मेदारी है कि वे गर्भवती स्त्री को पर्याप्त पोषण मुहैया कराए। इससे पता चलता है कि स्वास्थ्य मंत्री को अपने पद की जिम्मेदारी और संबंधित महकमे के अधिकारियों को अपनी ड्यूटी की कितनी समझ है और अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ने के लिए वे कैसी बेतुकी दलील दे सकते हैं! सवाल है कि किसी भी वजह से गंभीर हालत में पहुंचे मरीज को लेकर कोई व्यक्ति अस्पताल नहीं तो कहां जाएगा?

आखिर वे कौन-सी वजहें हैं कि बार-बार ऐसी घटनाओं के सामने आने के बावजूद सरकार चिकित्सा-प्रणाली की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने और गड़बड़ियों को दुरुस्त करने की जरूरत महसूस नहीं कर रही है। हालांकि देश के दूसरे इलाकों की हालत बेहतर नहीं है, पर छत्तीसगढ़ में ऐसा लगता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का समूचा तंत्र ही चरमरा गया है।

करीब महीने भर पहले ही बिलासपुर में सरकारी परिवार नियोजन कार्यक्रम के तहत महिलाओं की नसबंदी के लिए आयोजित एक शिविर में डॉक्टरों ने महज पांच घंटे में तिरासी आॅपरेशन कर डाले। उनमें से कई की हालत काफी बिगड़ गई और तेरह की मौत हो गई। अगर स्वास्थ्य विभाग के मंत्री और अधिकारियों की दलीलों को ध्यान में रखें तो उन मौतों के लिए कौन जिम्मेवार है? अगर बिलासपुर के सीआइएमएस जैसे अस्पताल में नवजात शिशुओं की जान बचाने के काम आने वाले इनक्यूबेटर, आइसीयू या जीवनरक्षक प्रणाली की पर्याप्त मौजूदगी नहीं है और वह अस्पताल एक तरह से डॉक्टरों के बजाय प्रशिक्षु चिकित्सकों के भरोसे चल रहा है तो इसके लिए कौन दोषी है? सरकारी अस्पतालों की शरण में आने वाले लोग आमतौर पर गरीब तबकों के होते हैं। वहां मरीजों के प्रति होने वाली उपेक्षा और संसाधनों की कमी क्या इसीलिए कोई गंभीर सवाल नहीं बन पाती है? क्या यह सरकारी चिकित्सा तंत्र इसीलिए संवेदनहीन बना हुआ है कि उसे कठघरे में खड़ा करने वाला कोई नहीं है?

 

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