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संपादकीय: आस्था के बरक्स

पाकिस्तान में ऐसे मामले सामने आने पर आरोपी पर हमले या हत्या की कई घटनाएं सामने आ चुकी थीं। लेकिन अब वहां के सुप्रीम कोर्ट ने ईश निंदा के मामले में धार्मिक सहिष्णुता का एक बेहद अहम संदेश दिया है।

Author November 2, 2018 2:39 AM
पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट। (File Photo)

पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने ईश निंदा के आरोप में मुकदमे का सामना कर रही महिला को बरी करके एक तरह से बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। हालांकि इस फैसले के विरोध में पाकिस्तान के कई इलाकों में लोगों ने प्रदर्शन किया। मगर राहत की बात यह है कि वहां इमरान खान की नई सरकार ने अदालत का फैसला लागू करने को लेकर अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की है और लोगों से शांत रहने की अपील की है। उन्होंने हिंसा करने वाले लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की भी चेतावनी दी। सरकार का यह रुख अहम इसलिए है कि किसी भी देश में सत्ता और तंत्र को संचालित करने वाले समूह सांस्कृतिक मोर्चे पर भी नई जमीन तैयार करते हैं। गौरतलब है कि पाकिस्तान में ईश-निंदा कानून के तहत धर्म और ईश्वर पर प्रतिकूल टिप्पणी करने के खिलाफ सख्त कानून है। करीब आठ साल पहले आसिया बीबी की एक टिप्पणी के बाद उस पर ईश-निंदा का आरोप लगाया गया था और इस क्रम में निचली अदालतों ने उसे मौत की सजा सुनाई थी।

दुनिया के सारे मजहब या धर्म और उनके आचार-व्यवहार तय करने वाले धर्माधिकारी यह दावा बढ़-चढ़ कर करते हैं कि उनका धर्म सबसे ज्यादा मानवीय मूल्यों से लैस है। पर ऐसे मामले अक्सर सामने आते रहते हैं, जिनमें किसी गैर-मजहब वाले व्यक्ति की राय या टिप्पणी से सहमति नहीं होने पर उसे आपत्तिजनक ठहरा दिया जाता है और संबंधित धर्म या परंपरा में विश्वास रखने वाले लोग इसे अपनी आस्था पर हमला बता कर आक्रामक रवैया अख्तियार कर लेते हैं। मुश्किल यह है कि इस तरह की आस्था को आधार बना कर कुछ देश या सरकारें बेहद सख्त कानून भी बना देती हैं, जिसके बाद धर्म और ईश्वर से जुड़ी किसी बात पर कोई टिप्पणी करना कई बार जानलेवा भी साबित हो जाता है। पाकिस्तान में ऐसे मामले सामने आने पर आरोपी पर हमले या हत्या की कई घटनाएं सामने आ चुकी थीं। लेकिन अब वहां के सुप्रीम कोर्ट ने ईश निंदा के मामले में धार्मिक सहिष्णुता का एक बेहद अहम संदेश दिया है। दूसरी ओर, भारत के पंजाब में ईश निंदा के मसले पर हाल ही में एक सख्त कानून बना कर उसे लागू करने की कोशिश हो रही है।

सवाल है कि अगर कोई भी धर्म व्यापक मानव समुदाय के हित को अपना लक्ष्य मानता है तो भिन्न राय जाहिर करने वाले व्यक्ति के प्रति वह सहिष्णुता क्यों नहीं दर्शाता! यों धार्मिक होने के बावजूद ज्यादातर लोगों के लिए अपना जीवन सहज तरीके से चलाना ही प्राथमिक होता है। पर विडंबना है कि आमतौर पर हर धर्म से जुड़े कट्टरपंथी तबके अपना वर्चस्व कायम रखने के मकसद से कुछ खास नियम-कायदे प्रचलित कर देते हैं। धर्म चूंकि आस्था से जुड़ा मामला है, इसलिए वे साधारण लोगों की भावनाओं में धर्म और ईश्वर को लेकर तीव्र स्तर का असुरक्षाबोध और आक्रामकता भरने में कामयाब हो जाते हैं। जबकि इस सिरे से उभरी प्रतिक्रिया कई बार दूसरे धर्मों के प्रति नफरत में तब्दील हो जाती है और इससे आखिरी तौर पर मानवीय मूल्यों को नुकसान पहुंचता है। अलग-अलग विचारों के प्रति सहिष्णु होना और इंसानियत को फलने-फूलने देना ही किसी भी धर्म की खूबसूरती है। इस लिहाज से देखें तो पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में जितना ईश निंदा के आरोप से महिला को राहत दी है, उससे ज्यादा मजहब के मानवीय मूल्यों को बहाल किया है।

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