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संपादकीय: सर्दी का सितम

ऐसा हर साल देखने को मिलता है। सर्द हवाएं, बर्फबारी, बारिश, इनसे होने वाली मुश्किलें और नुकसान कोई नई बात नहीं हैं। नई बात यह है कि पिछले कुछ सालों में ठंड की अवधि और तीव्रता दोनों में बदलाव आया है। इसका असर यह हुआ है कि हर साल सर्दी किसी न किसी रूप में पिछले रेकार्ड तोड़ रही है।

Author January 7, 2019 2:54 AM
कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड आदि पहाड़ी राज्यों में बर्फबारी से जनजीवन ठप-सा है। (Express photo by Nirmal Harindran)

उत्तर भारत इन दिनों ठंड की चपेट में है। कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड आदि पहाड़ी राज्यों में बर्फबारी से जनजीवन ठप-सा है। मैदानी इलाकों में भी कई जगह पारा शून्य से नीचे चल रहा है। हिमाचल में सक्रिय हुई पश्चिमी हवाओं से शीतलहर चल रही है। राज्य के कुछ मैदानी इलाकों का तापमान तो शिमला से भी कम बना हुआ है। कोहरे की मार अलग पड़ रही है। यही स्थिति उत्तराखंड की है। ऊंचाई वाले इलाके बर्फ की चादर में लिपटे हुए हैं। कड़ाके की ठंड लोगों का जीना मुश्किल कर देती है। इसका असर हर तरफ देखने को मिल रहा है। घने कोहरे की वजह से ट्रेनें औसतन दस से बीस घंटे देरी से चल रही हैं, विमान सेवाएं भी सुचारु नहीं हैं। सड़कों पर यातायात ठहरा-सा है। कई जगह घने कोहरे की वजह से सड़क हादसों की खबरे आई हैं, जिनमें कइयों को जान से हाथ धोना पड़ा तो कई जख्मी भी हुए। कड़ाके की ठंड में मरीजों खासकर बुजुर्गों और बच्चों की हालत बिगड़ती है और अस्पतालों में मरीजों की भीड़ बढ़ने लगती है। इन सबसे तो लगता है कि सर्दी का मौसम आनंद की बजाय कष्टप्रद ज्यादा होता जा रहा है।

ऐसा हर साल देखने को मिलता है। सर्द हवाएं, बर्फबारी, बारिश, इनसे होने वाली मुश्किलें और नुकसान कोई नई बात नहीं हैं। नई बात यह है कि पिछले कुछ सालों में ठंड की अवधि और तीव्रता दोनों में बदलाव आया है। इसका असर यह हुआ है कि हर साल सर्दी किसी न किसी रूप में पिछले रेकार्ड तोड़ रही है। करीब तीन दशक पहले तक तो सर्दी की अवधि औसतन चार या पांच महीने रहती थी। अक्तूबर से गुलाबी सर्दी का असर होने लगता था और दिसंबर-जनवरी में तो हांड़ कंपा देने वाली हवाएं चलती थीं और होली आने तक ठंड अपनी मौजूदगी बनाए रखती थी। पर अब यह चक्र बदल रहा है। इसी से मौसम का मिजाज भी बदला है। दिसंबर का महीना भी कड़ाके की ठंड का अहसास नहीं कराता, अक्तूबर और नवंबर के महीने में तो पंखे चलते हैं। इसी तरह पहाड़ी क्षेत्रों में बर्फबारी का समय भी बदल रहा है। और मौसम के बदलते चक्र से भारत ही नहीं, पूरी दुनिया प्रभावित हो रही है। इसका बड़ा और एकमात्र कारण जलवायु संकट है। तो ऐसे में सर्दी को क्यों दोष दिया जाए?

सर्दी तो हर साल आती रही है, आती रहेगी और अपना असर दिखाएगी। इससे क्यों परेशान होना! सवाल सर्दी के मौसम में होने वाली उन समस्याओं को लेकर है जिनका हम हर साल सामना करते हैं। लेकिन अगली बार वैसी मुश्किलों का सामना न करना पड़े, इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाते। कहने को सर्दी का मौसम हर लिहाज से अच्छा माना जाता है। लोग बर्फबारी का मजा लेने पहाड़ी पर्यटन स्थलों की यात्रा करते हैं। हालांकि दिल्ली जैसे शहर जो गंभीर प्रदूषण की मार झेल रहे हैं, उनके लिए सर्दी ज्यादा कष्टप्रद साबित हो रही है। और इसलिए नहीं कि तापमान शून्य के आसपास रहेगा, या कोहरा पड़ेगा, बल्कि इसलिए कि हवा जहरीला हो चुकी है लोग सांस नहीं ले पा रहे। इसी कड़ाके की ठंड में बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर सोने को मजबूर हैं, जिन्हें सरकारी रैनबसेरों तक में जगह नहीं मिलती, खाना तो दूर। सर्दी जनित बीमारियां गरीब लोग इसलिए नहीं झेल पाते कि उनके पास अस्पताल जाने तक के भी पैसे नहीं होते। ऐसे में गरीब को सर्दी मारती है।

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