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संपादकीयः शांति का रास्ता

असम में अलग बोडोलैंड राज्य की मांग पिछले चार दशक से चल रही है और ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन (आबसू), यूनाइटेड बोडो पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन जैसे संगठन इस आंदोलन के अगुआ रहे हैं।

Author Updated: January 28, 2020 2:13 AM
बोडोलैंड आंदोलन चलाने वाले संगठन नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीएफबी) ने सोमवार को केंद्र सरकार के साथ शांति समझौते की जो पहल की है, वह स्वागतयोग्य है। हालांकि इस तरह का शांति समझौता हो पाना कोई आसान काम नहीं था, लेकिन केंद्र और राज्य सरकार ने उग्रवादियों से बातचीत की पहल करते हुए जो सकारात्मक रुख दिखाया, उसी का नतीजा है कि एनडीएफबी जैसे खूंखार संगठन ने भी शांति और बातचीत के विकल्प को तवज्जो दी है।

अलग बोडोलैंड राज्य की मांग को लेकर असम में लंबे समय से चले आ रहे हिंसात्मक आंदोलन ने अब शांति का रास्ता अपनाया है। बोडोलैंड आंदोलन चलाने वाले संगठन नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीएफबी) ने सोमवार को केंद्र सरकार के साथ शांति समझौते की जो पहल की है, वह स्वागतयोग्य है। हालांकि इस तरह का शांति समझौता हो पाना कोई आसान काम नहीं था, लेकिन केंद्र और राज्य सरकार ने उग्रवादियों से बातचीत की पहल करते हुए जो सकारात्मक रुख दिखाया, उसी का नतीजा है कि एनडीएफबी जैसे खूंखार संगठन ने भी शांति और बातचीत के विकल्प को तवज्जो दी है। हालांकि उग्रवाद को लेकर सरकार के कड़े रुख से भी उग्रवादी संगठनों को यह कड़ा संदेश तो गया ही है कि अब और ज्यादा हिंसा के रास्ते पर नहीं चला जा सकता और सरकार भी झुकने वाली नहीं है। इसलिए अगर उग्रवादी गुट हथियार डाल कर कोई सकारात्मक कदम उठाते हैं तो यह प्रशंसनीय है। सोमवार को केंद्रीय गृह मंत्री की मौजूदगी में दिल्ली में असम के मुख्यमंत्री और एनडीएफबी के विभिन्न धड़ों के बीच हुए इस त्रिपक्षीय समझौते को असम में अमन की दिशा में सरकार की बड़ी कामयाबी भी माना जा रहा है।

असम में अलग बोडोलैंड राज्य की मांग पिछले चार दशक से चल रही है और ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन (आबसू), यूनाइटेड बोडो पीपुल्स ऑ र्गनाइजेशन जैसे संगठन इस आंदोलन के अगुआ रहे हैं। लेकिन पिछले चार दशक से असम जिस तरह की राजनीति से रूबरू होता रहा है, उसमें उग्रवादी गुटों को पनपने के मौके मिलते गए और सरकारों ने ऐसे मुद्दों को बातचीत से हल करने के बजाय सख्ती से कुचलने की रणनीति पर ज्यादा जोर दिया। उसी का नतीजा रहा कि आज तक पूर्वोत्तर में अलग राज्यों की मांग को लेकर उग्रवादी गुट सक्रिय हैं। एक मोटे अनुमान के मुताबिक बोडो उग्रवादियों की हिंसा में पिछले चार दशक में चार हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। बोडो ब्रह्मपुत्र घाटी के उत्तरी हिस्से में बसी असम की सबसे बड़ी जनजाति है।

जब राज्य में इनकी जमीन पर दूसरे समुदायों का अनाधिकृत प्रवेश बढ़ने लगा और बोडो लोगों की जमीन और संसाधनों पर आंच आने लगी, तो असंतोष पनपना स्वाभाविक था। समस्या तब और गंभीर होती गई जब आंदोलन का नेतृत्व भी कई धड़ों में बंटता चला गया और फिर अलग-अलग गुटों ने हथियार उठाने को अंतिम विकल्प समझ लिया। ऐसे में सरकार किससे बात करे, या कौन सा धड़ा सरकार से बात करे, यह अड़चन बनी रही। एक-दो धड़े साथ होते हैं तो तीसरा उनके विरोध में आ जाता है और समस्या सुलझने के बजाय उलझती चली जाती है। यही बोडोलैंड आंदोलन के साथ भी हुआ।

फिलहाल केंद्र, राज्य और एनडीएफबी के बीच जो समझौता हुआ है, उसमें सबसे बड़ी बात तो यह है कि अब एनडीएफबी ने बोडोलैंड की मांग छोड़ दी है। एनडीएफबी के डेढ़ हजार से ज्यादा उग्रवादी तीस जनवरी को हथियार डाल देंगे। पर केंद्र और राज्य सरकार के समक्ष बड़ी चुनौती ये है कि वह बोडो क्षेत्रों में विकास के काम तत्काल शुरू करे। बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद् (बीटीसी) को और अधिकार दिए जाएं। मूल बात विकास की है। अगर सरकार बोडो इलाकों के आर्थिक विकास और राजनीतिक मसलों पर ध्यान दे, नौजवानों को रोजगार मिले तो कोई कारण नहीं कि बोडो समुदाय हथियार उठाने को मजबूर हो। यह समझौता शांति की दिशा में बड़ी पहल है, इसलिए हर पक्ष को अमल भी ईमानदारी से करना होगा।

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