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संपादकीय: समाधान का संकट

संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट ऐतिहासिक इस मायने में है कि इसमें सबसे ज्यादा चिंता धरती के बढ़ते तापमान को लेकर जताई गई है। कहा गया है कि धरती का तापमान एक डिग्री सेल्शियस बढ़ गया है और आने वाले दशकों में यह तीन से चार डिग्री और बढ़ सकता है।

Author October 9, 2018 1:58 AM
पृथ्वी।

जलवायु संकट पूरी धरती के लिए बड़ा खतरा बन गया है। लंबे समय से इसे लेकर चिंता जताई जा रही है और धरती को बचाने के लिए विश्व पर्यावरण सम्मेलनों में बड़ी-बड़ी घोषणाएं होती रही हैं। लेकिन ठोस समाधान की शुरुआत कहीं से दिखाई नहीं दे रही। इसलिए समस्या बढ़ती जा रही है। पर्यावरण की चिंता में घुल रहे देश आज तक इस बात पर सहमत नहीं हो पाए हैं कि बचाव की शुरुआत कैसे और कहां से हो। कार्बन उर्त्सजन घटाने के लिए क्या किया जाए। हालात विस्फोटक इसलिए हो गए हैं कि उद्योगों से लेकर घरों में इस्तेमाल होने वाले र्इंधन तक से निकलने वाला धुआं हवा को जहरीला बना रहा है। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र ने सोमवार को जारी अपनी एक ताजा रिपोर्ट में दुनिया के सारे देशों को चेताया है कि वक्त तेजी से गुजर रहा है और अब भी हम नहीं चेते तो धरती पर प्राणी जगत का अस्तित्व गंभीर खतरे में पड़ जाएगा। दक्षिण कोरिया के इंचियोन शहर में दुनिया के वैज्ञानिकों के साथ लंबे विचार-विमर्श के बाद यह रिपोर्ट जारी हुई। इसमें साफ तौर पर आगाह किया गया है कि धरती को आज जिन गंभीर संकटों का सामना करना पड़ रहा है, उनके कारण वैश्विक समाज और अर्थव्यवस्था भी गंभीर खतरे में हैं।

संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट ऐतिहासिक इस मायने में है कि इसमें सबसे ज्यादा चिंता धरती के बढ़ते तापमान को लेकर जताई गई है। कहा गया है कि धरती का तापमान एक डिग्री सेल्शियस बढ़ गया है और आने वाले दशकों में यह तीन से चार डिग्री और बढ़ सकता है। ऐसे में यह गंभीर सवाल खड़ा हो गया है कि क्या हम इतनी गरमी झेल पाएंगे? तवे जैसी तपती धरती पर से जीवों का खात्मा होने का यह बड़ा कारण बन सकता है। धरती की सतह का तापमान बढ़ने से ही महासागरों में भयंकर उथल-पुथल मच रही है और कई देशों को सुनामी और बड़े तूफानों का सामना करना पड़ रहा है। बेमौसम की बारिश, बाढ़ और सूखे जैसी आपदाएं इस बढ़ते तापमान का ही नतीजा हैं। अगर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं हुआ तो अगले एक दशक में ही धरती का तापमान डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा। वैज्ञानिकों की इस चेतावनी की अनदेखी इंसान के लिए भारी पड़ सकती है।

जलवायु संकट को लेकर भारत की स्थिति चौंकाने वाली है। जो संकट सामने हैं, उन्हें हम नजरअंदाज करते जा रहे हैं। पिछले डेढ़ सौ साल में दिल्ली का तापमान एक डिग्री सेल्शियस और कोलकाता का 1.2 डिग्री बढ़ गया है। इसी तरह मुंबई और चेन्नई की गरमी भी बढ़ी। तटीय शहर खतरे में इसलिए हैं कि गरमी बढ़ने से समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है और तटीय शहरों के समुद्र में समा जाने का खतरा बढ़ता जा रहा है। अगर डेढ़ से दो डिग्री तक तापमान बढ़ गया तो वह करोड़ों लोगों के लिए जानलेवा साबित होगा। गरमी बढ़ने से लू कहर बरपाएगी, फसलें झुलसने लगेंगी, जल स्रोत सूख जाएंगे। जहां भारी बारिश होगी, वहां बाढ़ से निपटना होगा, जैसा कि हाल में केरल में देखा है। दिक्कत यह है कि भारत में प्रदूषण से निपटने के लिए कहीं कोई ठोस पहल नहीं हुई है। वाहन प्रदूषण, घरों में जलने वाले र्इंधन, कचरा प्रबंधन जैसी समस्याओं से निपटने में सरकारें नाकाम साबित हुई हैं। हर साल पांच लाख से ज्यादा मौतें वायु प्रदूषण के कारण होती हैं। उत्तर भारत के बड़े हिस्से को हर साल कई महीनों तक खेतों में जलाई जाने वाली पराली के धुएं में घुटना पड़ता है। ऐसे में सवाल उठता है कि हम तापमान को बढ़ने से कैसे रोक पाएंगे!

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