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संपादकीय: अदालत का शिकंजा

आम्रपाली समूह के मालिकों की नीयत साफ होती तो शायद सुप्रीम कोर्ट को ऐसे कड़े निर्देश देने की नौबत नहीं आती। लेकिन कंपनी के इरादे ग्राहकों को फंसाए रखने और उनके पैसे से कारोबार बढ़ाने के बने रहे।

Author October 11, 2018 3:04 AM
सुप्रीम कोर्ट (फोटो सोर्स- एक्सप्रेस आर्काइव फोटो)

सुप्रीम कोर्ट ने आम्रपाली बिल्डर के खिलाफ जो सख्त कदम उठाया है, वह फ्लैट खरीदारों के संघर्ष की एक और बड़ी जीत है। यह समूह जिस तरह से अदालती आदेशों की अवहेलना का दुस्साहस करता रहा है, उससे साफ है कि इतना सब कुछ होने के बाद भी बड़े बिल्डरों में कानून को लेकर भय नहीं है। अगर फ्लैट खरीदारों ने अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया होता और उनके हित में सुप्रीम कोर्ट ने कड़े कदम नहीं उठाए होते तो ऐसे बिल्डर कब के भाग निकले होते। लेकिन सर्वोच्च अदालत के कड़े रुख ने बिल्डरों को कानून के दायरेमें बांध दिया है। इससे अब इतना तो तय है कि ग्राहकों के पैसे पर नजर गड़ाए बिल्डर भाग नहीं सकेंगे। बुधवार को सर्वोच्च अदालत ने आम्रपाली समूह की नौ संपत्तियों को सील करने का निर्देश दिया। इन जगहों पर इस समूह की छियालीस कंपनियों से संबंधित वे दस्तावेज रखे हैं जो जांच अधिकारियों के सुपुर्द किए जाने थे। लेकिन शीर्ष अदालत के निर्देशों के बावजूद कंपनी के निदेशकों ने इन्हें जांच अधिकारियों के हवाले नहीं किया। इसी से नाराज होकर कंपनी के तीन निदेशकों को अदालत ने पुलिस हिरासत में भेजा। सख्त कार्रवाई के बाद भी बड़े बिल्डर सर्वोच्च अदालत को गंभीरता से नहीं ले रहे, इसलिए इन पर लगाम कसना अपरिहार्य हो गया है।

आम्रपाली की बीस परियोजनाओं में बयालीस हजार ग्राहकों को अब तक फ्लैट नहीं मिले हैं। ज्यादातर ग्राहक फ्लैट की कुल कीमत की नब्बे फीसद रकम तक जमा करा चुके हैं। यानी कंपनी के पास ग्राहकों की भारी रकम जमा है। अदालत ने कंपनी से जो दस्तावेज जांच अधिकारियों को सौंपने को कहे हैं, वे 2008 से 2015 के बीच के हैं और उन्हें अदालत में बतौर सबूत मान्यता हासिल है। इसीलिए कंपनी इन्हें देने से बचती रही है। जाहिर है, कंपनी की नीयत साफ नहीं है और ये दस्तावेज उसके खिलाफ बड़ा और पुख्ता सबूत हैं। दरअसल, पिछले दो दशक में दिल्ली और इसके आसपास के इलाकों में बड़े बिल्डरों ने तेजी से अपना कारोबार फैलाया और लोगों को सस्ते फ्लैटों का सपना दिखाया। ज्यादातर बड़ी बिल्डर कंपनियों ने जमीन खरीदने से लेकर उस पर निर्माण तक में किसी नियम-कानून का पालन नहीं किया, न ही ग्राहकों को कभी कोई सही जानकारी दी। इसके पीछे बड़ा खेल यह चलता रहा कि ग्राहकों से फ्लैट बुकिंग का जो पैसा आता वह दूसरी परियोजना में लगा दिया जाता। इस तरह सब जगह लोगों से पैसा तो लिया जाता रहा, लेकिन कहीं भी परियोजना पूरी नहीं की गई। नतीजा यह हुआ कि ग्राहक फंस गए और उन्हें दस-दस साल के इंतजार के बाद भी फ्लैट नहीं मिले।

आम्रपाली समूह के मालिकों की नीयत साफ होती तो शायद सुप्रीम कोर्ट को ऐसे कड़े निर्देश देने की नौबत नहीं आती। लेकिन कंपनी के इरादे ग्राहकों को फंसाए रखने और उनके पैसे से कारोबार बढ़ाने के बने रहे। घर खरीदना किसी सपने से कम नहीं होता है। इसके लिए लोग अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा मकान में लगा देते हैं। ज्यादातर लोग बैंकों से कर्ज लेकर बिल्डरों को पैसा देते हैं। लेकिन जब लंबे इंतजार के बाद भी मकान नहीं मिलते तो नौकरीपेशा व्यक्ति के लिए घर का सपना जिंदगी का सबसे बड़ा संकट बन जाता है। ग्राहकों को राहत दिलाने के लिए ही सुप्रीम कोर्ट ने जेपी समूह, लोढ़ा समूह, यूनिटेक, सुपरटेक, डीएलएफ और पार्श्वनाथ जैसी तमाम बड़ी नामी बिल्डर कंपनियों पर भी शिकंजा कसा है। अदालत के इस सख्त कदम से बिल्डरों को भी यह तो समझ में आ गया है कि ग्राहकों से छल करना अब आसान नहीं होगा!

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