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संपादकीय: भेदभाव के विरुद्ध

दरअसल, धार्मिक मामलों को इतना संवेदनशील बना दिया गया है कि उनमें किसी प्रथा पर सवाल उठाना एक जोखिम से कम नहीं होता है। सबरीमाला की तरह देश के कई मंदिरों में अलग-अलग वजहों से महिलाओं का प्रवेश वर्जित माना जाता रहा है।

Author September 29, 2018 2:19 AM
पांच महिला वकीलों के एक समूह ने केरला हिंदू प्लेसेज ऑफ पब्लिक वर्कशिप (अथॉराइजेशन ऑफ एंट्री) रूल्स, 1965 के रूल 3 बी को चुनौती दी थी। (फाइल फोटो)

शायद कोई भी सभ्य समाज वैसी मान्यता का समर्थन नहीं करेगा, जिसके तहत किसी धार्मिक गतिविधि या ईश्वर के प्रति आस्था की अभिव्यक्ति में दो सामाजिक वर्गों के बीच भेदभाव किया जाता हो। लेकिन केरल के पत्तनमतिट्टा जिले में स्थित सबरीमाला मंदिर में जिस तरह लगभग आठ सौ सालों से दस से पचास साल के बीच की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी लगी हुई थी, उसे ईश्वर की पूजा करने के मामले में स्त्री-पुरुष के बीच घोर भेदभाव के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि पितृसत्तात्मक मूल्यों से संचालित इस परंपरा पर सवाल उठे और इसे खत्म करने की लड़ाई लंबे समय से जारी थी। अब इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों के पीठ ने बहुमत से शुक्रवार को सबरीमाला मंदिर में जारी विषमता को पूरी तरह से खारिज किया और सभी उम्र की महिलाओं को वहां जाकर पूर्जा-अर्चना की इजाजत दे दी। हालांकि इस पीठ में से जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने अपनी असहमति दर्ज की और धार्मिक रिवायतों के बीच में न्यायिक हस्तक्षेप को गैरजरूरी बताया। लेकिन बाकी चार जजों ने इस मसले पर जो राय जाहिर की, उसकी अपेक्षा किसी भी प्रगतिशील समाज को होगी। अदालत ने साफतौर पर कहा कि सभी को बिना किसी भेदभाव के मंदिर में पूजा करने की अनुमति मिलनी चाहिए; जैविक आधार पर किसी को भी मंदिर में प्रवेश से नहीं रोका जा सकता।

यह अपने आप में एक विचित्र बात है कि जिस धर्म में आस्था रखने वाले लोगों की तादाद इतनी बड़ी हो, उसकी नैतिकता का फैसला चंद लोग करें। अगर किसी धर्म के संचालक एक समुदाय के स्त्री-पुरुष को अपना अनुयायी मानते हैं तो उन्हें अपनी आस्था की अभिव्यक्ति के लिए सबके एक समान अधिकार को स्वीकार करना चाहिए। लेकिन पूर्वग्रहों की वजह से लोगों के बीच भेदभाव को कायम रखना या फिर बढ़ावा देना अमानवीय मूल्यों को स्वीकृति देना है। सवाल है कि क्या धर्म-तंत्र के एक संचालक के रूप में सबरीमाला के पुजारी और वहां का प्रबंधन इस तरह की विषमता को बढ़ावा दे रहे थे! हैरानी की बात यह है कि अब तक दुनिया भर में स्त्री-पुरुष समानता के लिए चले आंदोलनों की वजह से आए तमाम बदलावों के बावजूद सबरीमाला मंदिर प्रबंधन से लेकर वहां धार्मिक गतिविधियों में शामिल लोगों को इस परंपरा पर पुनर्विचार करने की जरूरत महसूस नहीं हुई कि कैसे यह महिलाओं के खिलाफ भेदभाव की दृष्टि के जरिए समानता के मूल्यों के विरोध में है।

दरअसल, धार्मिक मामलों को इतना संवेदनशील बना दिया गया है कि उनमें किसी प्रथा पर सवाल उठाना एक जोखिम से कम नहीं होता है। सबरीमाला की तरह देश के कई मंदिरों में अलग-अलग वजहों से महिलाओं का प्रवेश वर्जित माना जाता रहा है। हालांकि धार्मिक मान्यताओं और उससे जुड़ी पारलौकिक धारणाओं के मामले में ऐसे भेदभाव को भी सहजता से स्वीकार किया जाता है और इन पर आपत्ति जताना किसी परंपरा की कथित पवित्रता को भंग करने की तरह देखा जाता है। जबकि ईश्वर में विश्वास और आस्था की अभिव्यक्ति का अधिकार सबके लिए समान होना चाहिए। यों भी, अगर कोई धार्मिक व्यवस्था अपने अनुयायियों के बीच भेदभाव की परंपरा को कायम रखती है, तो उसे किस आधार पर समानता और न्याय का वाहक माना जाएगा! अच्छा यह है कि हाल के वर्षों में महिलाओं और कुछ अन्य सामाजिक वर्गों के बीच इस मसले पर जागरूकता बढ़ी है और उन्होंने ऐसी भेदभावपरक परंपराओं के खिलाफ आवाज उठाई है। इस लिहाज से देखें तो सुप्रीम कोर्ट ने अपने ताजा फैसले में समानता के उन्हीं स्वरों को वैधता दी है और यह स्वागतयोग्य है।

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