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संपादकीयः अराजकता की हिंसा

पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने राज्य में अपराध और कानून-व्यवस्था की स्थिति को ही मुख्य मुद्दा बनाया था और जनता से वादा किया था कि उसके सत्ता में आते ही सब दुरुस्त कर दिया जाएगा।

Author July 19, 2019 1:31 AM
सोनभद्र में जमीनी विवाद में 10 लोगों की हत्या, परिवार में शोक का माहौल

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में बुधवार को जो हुआ, उससे एक बार फिर यह सवाल उठा है कि क्या राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति पर किसी का नियंत्रण नहीं रह गया है और क्या अपराधियों को बेलगाम होकर मार-काट मचाने से रोकने वाला कोई नहीं है! घोरावल इलाके के उंभा गांव में दर्जनों ट्रैक्टरों पर सवार खतरनाक हथियारों से लैस कई सौ लोग जमीन पर कब्जा करने पहुंचे और जब गांव वालों ने विरोध जताया तो निहत्थे ग्रामीणों पर हथियारबंद लोगों ने खौफनाक तरीके से हमला कर दिया। धारदार हथियारों और असलहों से किए गए इस हमले में नौ लोगों की हत्या कर दी गई और दो दर्जन से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। अब पुलिस ने कई आरोपियों को गिरफ्तार किया है और अन्य की तलाश करने का दावा किया है, गांव में भारी संख्या में पुलिस बल तैनात है। लेकिन सरकारों और पुलिस की नींद तभी क्यों खुलती है जब मामला तूल पकड़ लेता है। सवाल है कि क्या यह समूचा मामला इतना गोपनीय था कि पुलिस को कोई पूर्व तैयारी करने का मौका नहीं मिला? क्या राज्य का पुलिस और खुफिया तंत्र इस तरह लाचार हालत में है कि इसके बारे में उसे कोई भनक नहीं लगी?

गौरतलब है कि उस इलाके में बसे आदिवासी समुदाय के लोग लंबे समय से सरकारी जमीन पर खेती करते आ रहे थे। यहां की ज्यादातर जमीन वनभूमि है और इस पर कब्जे को लेकर अक्सर विवाद सामने आते रहे हैं। जमीन के जिस मामले में ताजा कत्लेआम को अंजाम दिया गया, उस पर भी काफी समय से विवाद चल रहा था। गांव के प्रधान और आदिवासी समुदाय के लोगों के बीच किस तरह के टकराव की स्थिति बनी हुई थी, यह भी कोई गोपनीय जानकारी नहीं थी। बल्कि खबरें यहां तक आई हैं कि इस कत्लेआम को जमीन विवाद का नतीजा बता कर असली बात से ध्यान हटाने की कोशिश की जा रही है और यह भूदान की जमीन से आदिवासियों को बेदखल करने का मामला है। फिर इन विवादों को किन वजहों से इस हद तक पहुंचने के लिए छोड़ दिया गया था, जिसमें किसी एक पक्ष को सैकड़ों लोगों के साथ गांव पर हमला और लोगों की हत्या कर देने का मौका मिला? खतरनाक हथियारों से लैस इतनी बड़ी तादाद में लोगों के भीतर वहां बिना किसी बाधा के पहुंचने और कत्लेआम करने की हिम्मत कहां से आई? उनके भीतर इस भरोसे का क्या आधार था कि ऐसी हिंसा और अराजकता फैलाने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता?

पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने राज्य में अपराध और कानून-व्यवस्था की स्थिति को ही मुख्य मुद्दा बनाया था और जनता से वादा किया था कि उसके सत्ता में आते ही सब दुरुस्त कर दिया जाएगा। लेकिन हालत यह है कि पुलिसकर्मियों तक की हत्याएं हो रही हैं। राज्य में मौजूदा भाजपा राज में कानून-व्यवस्था की स्थिति और अपराधों की तस्वीर क्या रही है, यह किसी से छिपा नहीं है। मुठभेड़ों में अपराधियों को मार गिराने का दावा जरूर किया गया, लेकिन उन पर तीखे सवाल उठे। सच यह है कि राज्य में पिछले काफी समय से अपराधों की तस्वीर में कोई बड़ा फर्क नहीं आया है। ऐसा लगता है कि अपराधी तत्त्वों के बीच कानून का खौफ नहीं रह गया है। जिस दौर में अपराधों पर काबू पा लेने का दावा किया जा रहा है, उसमें इस तरह का मध्ययुगीन हमला अकल्पनीय लगता है।

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