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संपादकीयः प्रवेश में पारदर्शिता

चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई के बाद रोजगार का संकट बेशक न हो, पर इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि यह क्षेत्र बहुत संवेदनशील है। एक अकुशल चिकित्सक लोगों की जान के लिए खतरा साबित हो सकता है।

Author Published on: May 1, 2020 12:34 AM
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से चिकित्सा संस्थानों के दाखिले में और पारदर्शिता आने की उम्मीद बनी है।

अब सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से चिकित्सा संस्थानों के दाखिले में और पारदर्शिता आने की उम्मीद बनी है। अदालत ने आदेश दिया है कि राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा यानी नीट के नियम सहायता प्राप्त और गैर-सहायता प्राप्त निजी शिक्षण संस्थानों पर भी लागू होते हैं। इससे उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं होता। इस तरह सभी चिकित्सा और दंत चिकित्सा शिक्षण संस्थानों को इस नियम का पालन करना चाहिए, चाहे वे भाषायी अल्पसंख्यक के आधार पर मान्यता प्राप्त हों या फिर धार्मिक आधार पर। सर्वोच्च न्यायालय ने यह आदेश इसलिए दिया कि कुछ समय से देखा जा रहा था कि निजी शिक्षण संस्थान मोटी कैपीटेशन फीस लेकर ऐसे विद्यार्थियों को भी दाखिला दे देते हैं, जो नीट की पात्रता नहीं रखते। जाहिर है, ये पैसे वाले परिवारों के बच्चे होते हैं और इनके चलते बहुत सारे होनहार मगर गरीब परिवारों के बच्चों को दाखिले से वंचित रहना पड़ता है। इससे चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में सेवाओं की गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल असर नजर आता है। इसलिए कुछ चिकित्सा शिक्षण संस्थानों ने सर्वोच्च न्यायालय में दाखिले की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने और शिक्षा के नाम पर चल रही गड़बड़ियों पर विराम लगाने की गुहार लगाई थी।

दरअसल, उच्च शिक्षा के क्षेत्र में चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई पूरी कर लेने का अर्थ है कि युवाओं को नौकरी के लिए इधर-उधर भटकने की जरूरत नहीं पड़ती। वे चाहें तो स्वतंत्र रूप से क्लीनिक वगैरह खोल कर अपना पेशा शुरू कर सकते हैं। उनकी डिग्री के आधार पर इसके लिए उन्हें लाइसेंस मिल जाता है। उनमें से जो संपन्न घरों के बच्चे होते हैं, वे अपना अस्पताल भी खोल लेते हैं। और चिकित्सा के क्षेत्र में आमदनी कितनी है, यह किसी से छिपा नहीं है। इसलिए जो थोड़े संपन्न लोग हैं, उनकी कोशिश होती है कि अपने बच्चों का दाखिला चिकित्सा संस्थानों में करा दें। पहले जब दाखिले को लेकर कड़े नियम-कायदे नहीं थे, तब निजी शिक्षण संस्थानों में खूब मनमानी चलती थी। इसे ध्यान में रखते हुए नीट को अनिवार्य किया गया। तब भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यक संबंधी अपने संवैधानिक अधिकारों का हवाला देते हुए कुछ संस्थानों ने इस प्रवेश प्रक्रिया को चुनौती दी थी। तब ऐसे संस्थानों के लिए कुछ सीटें छोड़ दी गई थीं, जिस पर वे अपनी मर्जी से विद्यार्थियों को दाखिला दे सकते हैं। बाकी सीटों पर नीट से पात्रता परीक्षा पास करने वाले विद्यार्थियों को रखा जाता है। इस तरह उन संस्थानों ने अपने हिस्से की सीटों पर कमाई शुरू कर दी। उसी को रोकने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने ताजा आदेश दिया है।

चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई के बाद रोजगार का संकट बेशक न हो, पर इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि यह क्षेत्र बहुत संवेदनशील है। एक अकुशल चिकित्सक लोगों की जान के लिए खतरा साबित हो सकता है। इसलिए अगर सिर्फ कमाई के मकसद से अपात्र विद्यार्थियों को भी डिग्री और फिर लाइसेंस हासिल हो जाता है तो वे समाज के लिए खतरा बन जाते हैं। दूसरी तरफ, बहुत सारे योग्य विद्यार्थी इसलिए इस क्षेत्र में अपनी सेवाएं देने से वंचित रह जाते हैं कि उनके पास संस्थानों को देने के लिए पैसे नहीं हैं। आज बहुत सारे गरीब विद्यार्थियों को बैंकों से कर्ज लेकर पढ़ाई करनी और फिर जीवन भर उसकी भरपाई करनी पड़ती है। ऐसे में कुछ संपन्न लोगों के लिए डिग्री खरीदने का अवसर क्यों उपलब्ध रहना चाहिए।

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