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संपादकीय: आखिर दोषी

यह बेवजह नहीं है कि रामपाल की गिरफ्तारी का विरोध करने के लिए हिसार में बरवाला स्थित उसके आश्रम में सत्तर हजार से ज्यादा लोग जमा हो गए थे। इसके अलावा रामपाल ने अपनी सुरक्षा में निजी कमांडो भी तैनात कर लिए थे।

Author Hisar sessions court convicted his twenty-six followers including self-styled Baba Rampal | October 13, 2018 2:31 AM
स्वयंभू बाबा रामपाल सहित उसके छब्बीस अनुयायियों को दोषी करार दिया गया। (file photo)

हिसार की सत्र अदालत ने हत्या के दो मामलों और अन्य अपराधों के मुकदमे में गुरुवार को आखिरकार स्वयंभू बाबा रामपाल सहित उसके छब्बीस अनुयायियों को दोषी करार दिया। इसके साथ ही कई ऐसे सवाल उठे हैं, जो न केवल समाज में जागरूकता फैलाने के मोर्चे पर कमजोरी से जुड़े हुए हैं, बल्कि ऐसे बाबाओं के पनपने और फलने-फूलने में सरकार की लापरवाही को दर्शाते हैं। गौरतलब है कि नवंबर 2014 में सतलोक आश्रम में एक महिला की संदिग्ध हालात में मौत के मामले में गिरफ्तारी के सवाल पर पुलिस और रामपाल के समर्थकों के बीच हिंसक टकराव हुआ था, जिसमें पांच महिलाओं और एक बच्चे की मौत हो गई थी। इसके बाद आश्रम के संचालक रामपाल पर हत्या के दो मामले दर्ज किए थे। दरअसल, रामपाल की गिरफ्तारी के समय पुलिस को जिस जद्दोजहद से गुजरना पड़ा था और उस दौरान जो हिंसा हुई थी, वह अपने आप में बताने के लिए काफी है कि इस स्वयंभू बाबा ने अपने समर्थकों के बूते किस तरह एक स्वतंत्र और समांतर दुनिया बना ली थी और खुद को कानून से ऊपर मानने लगा था। विशेष पंथ और कष्ट निवारण के लिए विशेष पूजा के नाम पर उसने बड़ी तादाद में ऐसे अनुयायी तैयार कर लिए थे, जिनके लिए भी कानून की जगह शायद अपने तथाकथित बाबा के वचन के बाद थी।

यह बेवजह नहीं है कि रामपाल की गिरफ्तारी का विरोध करने के लिए हिसार में बरवाला स्थित उसके आश्रम में सत्तर हजार से ज्यादा लोग जमा हो गए थे। इसके अलावा रामपाल ने अपनी सुरक्षा में निजी कमांडो भी तैनात कर लिए थे। इसके बाद वहां रामपाल की गिरफ्तारी से पहले युद्ध जैसे हालात हो गए थे, जिसमें छह लोगों की जान चली गई और दो सौ से ज्यादा घायल हो गए थे। समझा जा सकता है कि देश में बतौर नागरिक रहते हुए इसकी नजर में कानून की क्या अहमियत थी। एक तरह से इसने अदालत, सरकार और पुलिस के सामने बड़ी चुनौती पेश कर दी कि कानून उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। ऐसे में पुलिस और प्रशासन ने अदालत के सख्त रवैये की वजह से बाद में जरूर सख्त कार्रवाई की, लेकिन उससे पहले सरकार ने जिस तरह उससे बातचीत के लिए प्रतिनिधि भेजने और उसे मनाने की कोशिश की, उससे सरकार की कमजोरी और इस स्वयंभू बाबा के राजनीतिक रसूख का पता चलता है। क्या सरकार की निगाह में उसके प्रति नरमी बरतना इसलिए जरूरी था कि उसके बाद समर्थकों का एक बड़ा तबका था, जो चुनावी राजनीति में उपयोगी हो सकता था? वरना क्या वजह है कि जिन अपराधों में बाकी आरोपियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई में कोई कोताही नहीं बरती जाती है, उसमें रामपाल के बारे में सारी हकीकत सामने होने के बावजूद उसके प्रति नरमी दिखाई गई?

सवाल यह भी है कि एक व्यक्ति आखिर किन नियम-कायदों के तहत इतने बड़े-बड़े आश्रम बनवा लेता है, उसके भीतर संदिग्ध गतिविधियां चलती रहती हैं, लेकिन वह पुलिस और प्रशासन की जांच की जद में नहीं आता है। आमतौर पर अपने कार्यक्षेत्र में हर गतिविधि के बारे में पूरा ब्योरा रखने वाला पुलिस महकमा आखिर इतने बड़े आश्रम और जमावड़े की गतिविधियों को निगरानी का मामला क्यों नहीं मानता है? निजी आस्था की दलील पर किसी समूह को कानून से आखिर किस हद तक छूट दी जा सकती है? जाहिर है, ऐसे बाबाओं की सभी गतिविधियों पर अगर शुरू से नजर रखी जाए तो उनकी ओर से सरकार और कानून-व्यवस्था के सामने इतनी बड़ी चुनौती नहीं खड़ी हो और उनके मामले में आम जनता के सामने भी तस्वीर साफ हो।

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