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संपादकीयः संकट में शिमला

शिमला का जल संकट वाकई भयावह है। हालात इतने गंभीर हैं कि हफ्ते भर से लोग बूंद-बूंद को तरस रहे हैं। एक-एक बाल्टी पानी के लिए रात-रात भर कतार में लग रहे हैं, तब भी पानी मिलने की गारंटी नहीं है।

Author May 31, 2018 4:41 AM
शिमला जल संकट: पानी के लिए कतार में खड़े लोग। फोटो सोर्स – इंडियन एक्सप्रेस

शिमला का जल संकट वाकई भयावह है। हालात इतने गंभीर हैं कि हफ्ते भर से लोग बूंद-बूंद को तरस रहे हैं। एक-एक बाल्टी पानी के लिए रात-रात भर कतार में लग रहे हैं, तब भी पानी मिलने की गारंटी नहीं है। यह पहला मौका है जब वहां लोग बाल्टियां लिए सड़कों पर खड़े हैं। हालांकि इस पहाड़ी शहर और प्रदेश की राजधानी में पानी की समस्या कई सालों से है, लेकिन इसका विकराल रूप अब सामने आया है। इस बार के जल संकट से सरकार और प्रशासन के हाथ-पांव फूले हुए हैं। मौजूदा हालात से निपटने के लिए उच्चस्तरीय समिति बनाई गई है, लेकिन पानी कहां से लाया जाए, यह किसी को नहीं सूझ रहा। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने मौजूदा जल संकट का संज्ञान लेते हुए कड़ा रुख अख्तियार किया है। उसने निर्देश दिया है कि वीआइपी इलाकों यानी मंत्रियों, जजों, अफसरों के इलाकों में टैंकरों की आपूर्ति एकदम बंद कर दी जाए और यह पानी जनता को मुहैया कराया जाए।

सवाल है कि क्या सरकार और प्रशासन को जरा भी भनक नहीं लगी कि आने वाले दिनों में पानी की ऐसी भारी किल्लत होगी? शिमला नगर निगम आखिर करता क्या रहा? पानी की आपूर्ति करने वाले महकमे को जरा भी इस संकट का आभास नहीं हुआ? जब पता है कि हर साल गरमी में वहां जल संकट रहता है, तो समय रहते उससे निपटने की दिशा में ठोस कदम क्यों नहीं उठाए जाते? ये ऐसे सवाल हैं जो सरकार और प्रशासन की लापरवाही की पोल खोलते हैं। जाहिर है, जब समस्या विस्फोट के रूप में सामने आई तो हायतौबा मचाने के अलावा कुछ किया भी नहीं जा सकता। इसीलिए अदालत को संज्ञान लेना पड़ा। पानी का बंदोबस्त कैसे किया जाए, यह काम नगर निगम और जलदाय विभाग का होता है, लेकिन हालात इतने बेकाबू हो चुके हैं कि अदालत को बताना पड़ रहा है कि क्या कदम उठाए जाएं। हाईकोर्ट ने शहर में पानी के एटीएम लगाने को कहा है। शहर में हफ्ते भर के लिए निर्माण कार्यों पर पाबंदी लगा दी गई है। सख्त हिदायत है कि लोग गाड़ियां न धोएं। अदालत के सुझावों से यह तो स्पष्ट है कि सरकार और प्रशासन ने अगर ऐसे निदानात्मक कदम पहले उठा लिए होते तो शायद आज यह नौबत न आती।

शिमला को पानी की आपूर्ति मुख्यरूप से अश्विनी नदी और गुम्मा नाले से होती है। लेकिन इसमें करीब चालीस फीसद पानी रिसाव में निकल जाता है। शिमला को सतलुज नदी से पानी पहुंचाने के लिए 1982 में सर्वेक्षण हुआ था और तब इस काम पर सत्ताईस करोड़ रुपए खर्च होने थे। लेकिन कुछ नहीं हुआ और आज यह परियोजना पांच सौ करोड़ से ऊपर निकल गई है। इससे लगता है कि सरकारों ने इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। शिमला पूरे साल पर्यटकों से भरा रहता है, लेकिन आज जल संकट की वजह से पर्यटकों से यहां नहीं आने की अपील की जा रही है। अंतरराष्ट्रीय ग्रीष्म महोत्सव रद्द कर दिया गया है। शिमला नगर निगम क्षेत्र की आबादी करीब पौने दो लाख है। गर्मियों में पर्यटकों की वजह से यह तादाद करीब एक लाख और बढ़ जाती है। शिमला का जल संकट आने वाले दिनों के लिए गंभीर चेतावनी है। अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो वह दिन दूर नहीं, जब दूसरे शहर भी ऐसे संकट से जूझते नजर आएं।

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