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संपादकीयः मौत का पुल

वाराणसी में निर्माणाधीन पुल के एक हिस्से के ढह जाने की घटना ने फिर यही साबित किया है कि हमारे यहां जोखिम वाले कामों में किस बदतरीन स्तर की लापरवाही बरती जाती है।

Author May 17, 2018 4:49 AM
वाराणसी में भीड़भाड़ वाले इलाके में व्यस्त सड़क यातायात को सहज बनाने के मकसद से पुल का निर्माण संभवत: उस क्षेत्र में चल रहे विकास कार्यक्रमों का ही हिस्सा होगा।

वाराणसी में निर्माणाधीन पुल के एक हिस्से के ढह जाने की घटना ने फिर यही साबित किया है कि हमारे यहां जोखिम वाले कामों में किस बदतरीन स्तर की लापरवाही बरती जाती है। इसका खयाल रखना शायद जरूरी नहीं समझा जाता कि किसी मामूली कोताही का नतीजा बड़े हादसे की वजह बन सकता है और नाहक लोगों की जान जा सकती है। वाराणसी में उत्तर प्रदेश सेतु निर्माण निगम के तहत निर्माणाधीन पुल जिस वक्त गिरा, उस समय उसके नीचे से दूसरे वाहन सामान्य स्थिति में गुजर रहे थे। अचानक एक बड़े हिस्से के गिरने से करीब एक दर्जन वाहन उसके नीचे दब गए और अठारह लोग मारे गए। निश्चित रूप से इसे एक हादसा ही कहा जाएगा, लेकिन सवाल है कि पुल निर्माण कार्य के दौरान जिस पैमाने पर आपराधिक लापरवाही बरती गई है, क्या इस काम में लगे अधिकारियों को इतने लोगों की मौत का जिम्मेदार नहीं माना जाना चाहिए? अब पुल निर्माण निगम ने हादसे के लिए प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया और दूसरी ओर इस त्रासद घटना के बाद मुख्य परियोजना प्रबंधक सहित चार अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया। मगर कई लोगों के मारे जाने के बाद प्रशासन जिस तेजी से सक्रिय हुआ और जिस शिद्दत से कार्रवाई की गई, अगर सभी अधिकारियों की ड्यूटी सही तरीके से सुनिश्चित करने के प्रति वही गंभीरता पहले बरती जाती तो शायद इतना बड़ा हादसा नहीं होता।

गौरतलब है कि वाराणसी में भीड़भाड़ वाले इलाके में व्यस्त सड़क यातायात को सहज बनाने के मकसद से पुल का निर्माण संभवत: उस क्षेत्र में चल रहे विकास कार्यक्रमों का ही हिस्सा होगा। लेकिन हैरानी की बात यह है कि खुद प्रधानमंत्री का निर्वाचन क्षेत्र होने के बावजूद संबंधित अधिकारियों ने सुरक्षा के लिहाज से निर्माण से संबंधित कार्यों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना और सावधानी बरतना जरूरी नहीं समझा। इस तरह के किसी भी निर्माण के दौरान हर समय एक तरह के जोखिम की स्थिति बनी रहती है, लेकिन इस काम का निर्देशन और देखरेख कर रहे अधिकारियों की लापरवाहियों का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि न केवल व्यस्त समय में पुल के एक स्लैब को जोड़ने का काम जारी था, बल्कि उसके नीचे से वाहनों की आवाजाही पर कोई रोक भी नहीं थी और न ही सुरक्षा घेरे को लेकर सख्ती बरती गई। जबकि सेतु निगम की ओर से कहा गया है कि हमारे अधिकारियों ने यातायात का मार्ग बदलने के लिए प्रशासन को कई बार चिट्ठी लिखी थी। अगर यह सही है तो इस हादसे में सेतु निगम से लेकर प्रशासन से जुड़े सभी संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी बनती है।

जाहिर है, अगर निर्माण कार्य के दौरान सुरक्षा संबंधी मामूली सावधानी बरती जाती तो पुल के एक हिस्से के ढहने के बावजूद इतनी बड़ी तादाद में लोगों की जान नहीं जाती। वाराणसी का यह हादसा इस तरह की अकेली घटना नहीं है। करीब दो साल पहले कोलकाता में एक निर्माणाधीन पुल के ढह जाने की ऐसी ही घटना हुई थी, जिसमें कई लोगों की जान चली गई थी। अमूमन इस तरह की हर घटना के बाद जांच के लिए समिति बना दी जाती है, लेकिन यह शायद ही कभी पता चलता है कि उसकी रिपोर्ट के आधार पर क्या कदम उठाए गए। जबकि किसी भी हादसे का सबसे बड़ा सबक यह होना चाहिए कि भविष्य में वे सारे इंतजाम किए जाएं, हर मोर्चे पर सावधानी बरती जाए, ताकि वैसी घटना दोबारा नहीं हो। मगर आमतौर पर देखा गया है कि जब तक कोई हादसा नहीं हो जाता, तब तक उससे बचने के इंतजामों पर बात शुरू नहीं होती।

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